सोमवार, 5 अगस्त 2024

पेड़ की वाणी

 पेड़ की वाणी 

हम मानव के भलाई में, 

उसके जीवन के उपजाऊ में- 

आती मै काम हमेशा । 

बचपन से बुजुर्ग के बाद भी, 

होती मानव को मेरी आवश्यकता ।


मै न होती तो मानव न होता, 

क्योंकि हमसे ही प्राप्त करता वो- 

जीवन का कितनी अनमोल उपहार, 

ऐ जग का सारा इंसान ।


गर्मी की उस करी धुप में जब ,

तप कर मानव थक जाता है ।

तब देख वह मुझे उस एकांत में- 

खुश हो आकर मेरे ही छांव में , 

बैठकर मानव हमेशा सुस्ताता है।


मै भी निःस्वर्थ भाव से मानव को- 

अपने आंचल को हीला सुस्त कराती हु, 

फिर भी प्यार न पाती हू, मै काटी जाती हू। 

कैसे होते है ये मानव ब्रज हृदय वल शाली , 

मैं यह कभी भी नही समझ पाती हूं ।


                                    अमित कुमार वंशी 

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