बूढ़ी माई की बोझ
चलले बानी एक सफर में ,
हम बहुत कुछ देख तानी ।
लेकिन ओहु मे एक खास बा,
हम मन ही मन ओके जोह तानी ।।
एक बूढ़ी माई बगले बैठल ,
आपन टोकरी खिसका ब तानी।।
बोझ रहे,भरल पूरा सामान से,
इतना उम्र मे काहे उठा ब तानी।।
रहल नही गईल पूछल बीन हमरो,
कहलस हमसे, नहीरा जाई तानी ।।
अभी त कम पर गईल सनेश हमरा,
लागता राउर आऊरो देवे के चाह तानी।।
सुन ई जवाब हमरा दिमाग बौराईल,
अंदर ही अंदर मन बहुत खीसीयाईल।
लेकिन ऊहो काहे कहिहन नही हमसे,
बाड़ी जीवन के पीड़ा से चिरचिड़ाईल।
ओहू में हम देहली आग लगाई ।।
फिर से कहली,ऐ माई मत खिसियाईं ,
तनिक ऐमे से दीही हमरो के चीखाई।।
कहनी एगो लमहर नोट थमाई ,
ई पुरा राऊर भईल ए बूढ़ी माई।।
तब आंचल से लोर पोछ कहनी हमसे,
जीवन में खानी हम आपन कमाई।।
एही बतीया जब संतान समझ पाई,
ई बोझ संघ मन के भी बोझ मीट जाई।।
बतियात - बतियात गईल स्टेशन आई ,
देहली माथ पर हम उनकर टोकरी धराई।।
सच मे ई बोझ उनका ला हलका रहे,
मन मे बाड़ी रखले बड़का बोझ छुपाई।।
अमित कुमार वंशी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें