शनिवार, 30 मई 2026

तुम लौट आना

ओ मेरी चाहत, ओ मेरी जान,

मैं आज भी हूँ वहीं पर हैरान।

उसी मोड़ पर खड़ा हूँ अकेला,

जहाँ छूटा था यादों का मेला।


कटते हैं दिन अब तो रोते-रुलाते,

रातें गुज़रती हैं तुमको बुलाते।

तेरे सिवा कोई भाता नहीं है,

दिल और कहीं दिल लगाता नहीं है।


सोचूँ किसी का जो होने की बात,

काँप उठती है रूह, ठहरते हैं जज़्बात।

मंजूर है तन्हा जीवन बिताना,

पर गैर के संग खुशियाँ मनाना...

अब इस दिल को गवारा नहीं है,

तेरे बिना कोई हमारा नहीं है।


माना कि तुममें भी थीं कुछ कमियाँ,

पर तुम ही तो थीं मेरी इन आँखों की नमियाँ।

आने से पहले जो ज़िन्दगी थी मेरी,

अब लौट पाऊँ, वो ताकत नहीं है मेरी।


तुम आईं, आदत बनीं, अपना बनाया,

फिर क्यों अंधेरों में मुझको सुलाया?

समझूँ मैं तुमको कोई दर्द या सपना,

जो भी थीं तुम, पर थीं तो अपना।


रहती अगर तुम उम्र भर हमारे,

हँसकर सहते हम दर्द ये सारे।

पर कुछ पलों का ये जो अधूरापन है,

घुटता इसी में अब मेरा ये मन है।


संसार में वैसे तो सबकुछ सजा है,

पर तेरे बिना हर एक लम्हा बेमज़ा है।

जैसे बिना स्वाद का कोई व्यंजन हो,

या बिन धड़कन का बेजान कोई तन हो।


ओ मेरी उल्फ़त, ओ मेरी जान,

खोया हुआ है मेरा जहान।

अगर कभी लौट सको, तो लौट आना,

मुश्किल है अब इस दिल को समझाना...

क्योंकि मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ,

जहाँ से हम अलग हुए थे...॥


                       अमित कुमार वंशी                     



अन्नदाता किसान

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