रविवार, 14 जून 2026

अन्नदाता किसान

 कभी सूखा, कभी बाढ़ का प्रहार सहता है,

फिर भी हर सुबह उम्मीदों के संग रहता है।

हिम्मत को अपना साथी बनाकर चल पड़ता है,

खेत-खलिहानों में दिन-रात पसीना बहाता है।


तपती दोपहरी हो या ठिठुरती रात,

धरती माँ की सेवा में रहता है हर बार।

जग को देता शुद्ध अन्न हर एक पल,

खुद रुखी-सुखी रोटी से करता है गुज़र-बसर।


जिसके मैले कपड़ों से लोग घृणा करते हैं,

उसी के श्रम से थालियाँ स्वाद से भरते हैं।

उसके तन की पसीने की गंध जो तुम्हें खलती है,

वही खुशबू बनकर तेरी थाली में चावल महकाती है।


विविध व्यंजनों से जब सजी होती है तेरी थाली,

याद रखना उसमें बसी है किसान की मेहनत निराली।

करो सम्मान उसका, हे मानव! सदा सिर झुकाकर,

उसके बिना जीवन अधूरा है, यह सत्य अपनाकर।


हारकर भी प्रकृति से वह बार-बार लड़ जाता है,

टूटे सपनों को फिर आशाओं से जोड़ जाता है।

कई रातें भूखा सो जाता है मायूस होकर,

लेकिन जग को देता है हर संसाधन हँसकर।


वह धरती का सच्चा वीर, राष्ट्र की शान है,

उसके श्रम से ही हर घर में मुस्कान है।

नमन करो उस अन्नदाता को बारम्बार,

जिसके कारण जीवन में है खुशियों का संसार। 

                                  अमित कुमार वंशी                         





अन्नदाता किसान

 कभी सूखा, कभी बाढ़ का प्रहार सहता है, फिर भी हर सुबह उम्मीदों के संग रहता है। हिम्मत को अपना साथी बनाकर चल पड़ता है, खेत-खलिहानों में दिन-र...