गुरुवार, 16 जुलाई 2026

बाबा के सिरहाने रखे कुछ रुपये

स्मृतियों की धुंधली गलियों में, जब अतीत उतरकर आता है,

बाबा! आपका स्नेहिल चेहरा मन के दीप जलाता है।


याद है मुझे वह स्वर अब भी, जिसमें अपनापन बहता था—

“वंशी, पैसे ले लेना बेटा, सिरहाने के पास रखा है।”


“जितना खर्च लगे, ले लेना, मन में संकोच न लाना,

पैसों के कारण, मेरे बच्चे, कभी कोई कष्ट न पाना।”


कितने साधारण थे वे शब्द,पर अर्थ अनन्त समाया था,

मेरे हर छोटे-से सपने में आपका हृदय समाया था।


न प्रश्न किया—कहाँ खर्च होंगे? न कोई लेखा माँगा था,

मेरे ऊपर विश्वास आपका ईश्वर से भी ऊँचा था।


आपने रुपये नहीं दिए थे, आपने राह दिखाई थी,

मेरी आँखों के हर सपने में अपनी नींद गँवाई थी।


जब भी कोई कठिनाई आई, जब भी मन घबराया था,

आपके शब्दों ने चुपके से मुझको फिर संभाला था।


अब भी जब मैं राहों पर हूँ, जब मंज़िल दूर दिखाई देती,

आपकी आवाज़ भीतर से कहती “वंशी, चिंता मत करना…

पैसों से कोई दिक्कत नहीं होगी।”


पर बाबा…अब सिरहाने के पास वो रुपये रखे नहीं मिलते,

आपको पुकारूँ तो आप लौटकर आते नहीं मिलते।


घर वही है, आँगन वही है, वही पुरानी दीवारें हैं,

पर आपकी आवाज़ के बिना सब सूनी-सूनी राहें हैं।


कभी मन करता है लौटकर आपके चरणों में बैठ जाऊँ,

कह दूँ— “बाबा, पैसे चाहिए…”और बचपन-सा मुस्काऊँ।


आप फिर कहते—“ले लो वंशी, जितना लगे ले लेना,

बस पैसों के कारण अपने सपनों को मत रोक देना।”


काश समय फिर लौट सके, काश वो दिन फिर आ जाए,

काश बाबा की एक पुकार फिर मेरे कानों तक आ जाए।


पर समय की कठोर धारा पीछे मुड़कर आती नहीं,

बाबा की प्यारी छाया फिर आँखों से जाती नहीं।


आज समझ पाया हूँ बाबा—वो रुपये केवल रुपये न थे,

वे आपकी तपती हथेली के स्नेह-सिक्त आँसू थे।


वे मेरी राहों की पूँजी थे, वे मेरे सपनों का मान थे,

वे मेरे जीवन के अंधेरों में आपके जलते दीप समान थे।


आज भले ही हाथों में आपके दिए रुपये नहीं हैं,

पर बाबा, आपकी दी हुई हिम्मत आज भी मुझसे दूर नहीं है।


मैं जब भी टूटता हूँ भीतर, आप मुझे संभाल लेते हैं,

यादों के उस पुराने घर से चुपके से मुस्कुरा देते हैं।


और मैं फिर उठ खड़ा होता हूँ, फिर संघर्षों से लड़ता हूँ,

क्योंकि मैं केवल वंशी नहीं—आपका वंशी हूँ, बाबा!


जिस दिन मेरी मंज़िल होगी, जिस दिन सपने साकार होंगे,

उस दिन सबसे पहले बाबा, आँसू मेरे तैयार होंगे।


आकाश की ओर देखकर कहूँगा—

“बाबा, देखिए… आपका वंशी आया है,

आपके दिए हुए विश्वास ने आज मुझे यहाँ पहुँचाया है।”


आप दूर सही, पर पास हैं बाबा, मेरी हर धड़कन में रहते हैं,

सिरहाने के पास रखे रुपयों से कहीं अधिक 

आप मेरी आत्मा में रहते हैं।


और आज भी, जब जिंदगी मुझे डराती है,

आपकी आवाज़ भीतर से आती है—

“वंशी…जितना खर्च लगे, ले लेना,

पैसों के कारण कोई दिक्कत नहीं होना चाहिए…”


बाबा…पैसे तो अब सिरहाने के पास नहीं हैं,

पर आपका आशीर्वाद आज भी सिरहाने रखा है।

और शायद इसी कारण आपका वंशी आज भी

कभी किसी मोड़ पर हारना नहीं जानता है । 





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