अमित कुमार वंशी की कविताएं
शुक्रवार, 24 जुलाई 2026
क्या यही है वो देश जिसकी हमने तमन्ना की थी?
जनता कब तक चुप रहेगी?
गुरुवार, 16 जुलाई 2026
बाबा के सिरहाने रखे कुछ रुपये
स्मृतियों की धुंधली गलियों में, जब अतीत उतरकर आता है,
बाबा! आपका स्नेहिल चेहरा मन के दीप जलाता है।
याद है मुझे वह स्वर अब भी, जिसमें अपनापन बहता था—
“वंशी, पैसे ले लेना बेटा, सिरहाने के पास रखा है।”
“जितना खर्च लगे, ले लेना, मन में संकोच न लाना,
पैसों के कारण, मेरे बच्चे, कभी कोई कष्ट न पाना।”
कितने साधारण थे वे शब्द,पर अर्थ अनन्त समाया था,
मेरे हर छोटे-से सपने में आपका हृदय समाया था।
न प्रश्न किया—कहाँ खर्च होंगे? न कोई लेखा माँगा था,
मेरे ऊपर विश्वास आपका ईश्वर से भी ऊँचा था।
आपने रुपये नहीं दिए थे, आपने राह दिखाई थी,
मेरी आँखों के हर सपने में अपनी नींद गँवाई थी।
जब भी कोई कठिनाई आई, जब भी मन घबराया था,
आपके शब्दों ने चुपके से मुझको फिर संभाला था।
अब भी जब मैं राहों पर हूँ, जब मंज़िल दूर दिखाई देती,
आपकी आवाज़ भीतर से कहती “वंशी, चिंता मत करना…
पैसों से कोई दिक्कत नहीं होगी।”
पर बाबा…अब सिरहाने के पास वो रुपये रखे नहीं मिलते,
आपको पुकारूँ तो आप लौटकर आते नहीं मिलते।
घर वही है, आँगन वही है, वही पुरानी दीवारें हैं,
पर आपकी आवाज़ के बिना सब सूनी-सूनी राहें हैं।
कभी मन करता है लौटकर आपके चरणों में बैठ जाऊँ,
कह दूँ— “बाबा, पैसे चाहिए…”और बचपन-सा मुस्काऊँ।
आप फिर कहते—“ले लो वंशी, जितना लगे ले लेना,
बस पैसों के कारण अपने सपनों को मत रोक देना।”
काश समय फिर लौट सके, काश वो दिन फिर आ जाए,
काश बाबा की एक पुकार फिर मेरे कानों तक आ जाए।
पर समय की कठोर धारा पीछे मुड़कर आती नहीं,
बाबा की प्यारी छाया फिर आँखों से जाती नहीं।
आज समझ पाया हूँ बाबा—वो रुपये केवल रुपये न थे,
वे आपकी तपती हथेली के स्नेह-सिक्त आँसू थे।
वे मेरी राहों की पूँजी थे, वे मेरे सपनों का मान थे,
वे मेरे जीवन के अंधेरों में आपके जलते दीप समान थे।
आज भले ही हाथों में आपके दिए रुपये नहीं हैं,
पर बाबा, आपकी दी हुई हिम्मत आज भी मुझसे दूर नहीं है।
मैं जब भी टूटता हूँ भीतर, आप मुझे संभाल लेते हैं,
यादों के उस पुराने घर से चुपके से मुस्कुरा देते हैं।
और मैं फिर उठ खड़ा होता हूँ, फिर संघर्षों से लड़ता हूँ,
क्योंकि मैं केवल वंशी नहीं—आपका वंशी हूँ, बाबा!
जिस दिन मेरी मंज़िल होगी, जिस दिन सपने साकार होंगे,
उस दिन सबसे पहले बाबा, आँसू मेरे तैयार होंगे।
आकाश की ओर देखकर कहूँगा—
“बाबा, देखिए… आपका वंशी आया है,
आपके दिए हुए विश्वास ने आज मुझे यहाँ पहुँचाया है।”
आप दूर सही, पर पास हैं बाबा, मेरी हर धड़कन में रहते हैं,
सिरहाने के पास रखे रुपयों से कहीं अधिक
आप मेरी आत्मा में रहते हैं।
और आज भी, जब जिंदगी मुझे डराती है,
आपकी आवाज़ भीतर से आती है—
“वंशी…जितना खर्च लगे, ले लेना,
पैसों के कारण कोई दिक्कत नहीं होना चाहिए…”
बाबा…पैसे तो अब सिरहाने के पास नहीं हैं,
पर आपका आशीर्वाद आज भी सिरहाने रखा है।
और शायद इसी कारण आपका वंशी आज भी
कभी भी किसी मोड़ पर हारना सिखा नहीं है ।
रविवार, 14 जून 2026
अन्नदाता किसान
कभी सूखा, कभी बाढ़ का प्रहार सहता है,
फिर भी हर सुबह उम्मीदों के संग रहता है।
हिम्मत को अपना साथी बनाकर चल पड़ता है,
खेत-खलिहानों में दिन-रात पसीना बहाता है।
तपती दोपहरी हो या ठिठुरती रात,
धरती माँ की सेवा में रहता है हर बार।
जग को देता शुद्ध अन्न हर एक पल,
खुद रुखी-सुखी रोटी से करता है गुज़र-बसर।
जिसके मैले कपड़ों से लोग घृणा करते हैं,
उसी के श्रम से थालियाँ स्वाद से भरते हैं।
उसके तन की पसीने की गंध जो तुम्हें खलती है,
वही खुशबू बनकर तेरी थाली में चावल महकाती है।
विविध व्यंजनों से जब सजी होती है तेरी थाली,
याद रखना उसमें बसी है किसान की मेहनत निराली।
करो सम्मान उसका, हे मानव! सदा सिर झुकाकर,
उसके बिना जीवन अधूरा है, यह सत्य अपनाकर।
हारकर भी प्रकृति से वह बार-बार लड़ जाता है,
टूटे सपनों को फिर आशाओं से जोड़ जाता है।
कई रातें भूखा सो जाता है मायूस होकर,
लेकिन जग को देता है हर संसाधन हँसकर।
वह धरती का सच्चा वीर, राष्ट्र की शान है,
उसके श्रम से ही हर घर में मुस्कान है।
नमन करो उस अन्नदाता को बारम्बार,
जिसके कारण जीवन में है खुशियों का संसार।
अमित कुमार वंशी
शनिवार, 30 मई 2026
तुम लौट आना
ओ मेरी चाहत, ओ मेरी जान,
मैं आज भी हूँ वहीं पर हैरान।
उसी मोड़ पर खड़ा हूँ अकेला,
जहाँ छूटा था यादों का मेला।
कटते हैं दिन अब तो रोते-रुलाते,
रातें गुज़रती हैं तुमको बुलाते।
तेरे सिवा कोई भाता नहीं है,
दिल और कहीं दिल लगाता नहीं है।
सोचूँ किसी का जो होने की बात,
काँप उठती है रूह, ठहरते हैं जज़्बात।
मंजूर है तन्हा जीवन बिताना,
पर गैर के संग खुशियाँ मनाना...
अब इस दिल को गवारा नहीं है,
तेरे बिना कोई हमारा नहीं है।
माना कि तुममें भी थीं कुछ कमियाँ,
पर तुम ही तो थीं मेरी इन आँखों की नमियाँ।
आने से पहले जो ज़िन्दगी थी मेरी,
अब लौट पाऊँ, वो ताकत नहीं है मेरी।
तुम आईं, आदत बनीं, अपना बनाया,
फिर क्यों अंधेरों में मुझको सुलाया?
समझूँ मैं तुमको कोई दर्द या सपना,
जो भी थीं तुम, पर थीं तो अपना।
रहती अगर तुम उम्र भर हमारे,
हँसकर सहते हम दर्द ये सारे।
पर कुछ पलों का ये जो अधूरापन है,
घुटता इसी में अब मेरा ये मन है।
संसार में वैसे तो सबकुछ सजा है,
पर तेरे बिना हर एक लम्हा बेमज़ा है।
जैसे बिना स्वाद का कोई व्यंजन हो,
या बिन धड़कन का बेजान कोई तन हो।
ओ मेरी उल्फ़त, ओ मेरी जान,
खोया हुआ है मेरा जहान।
अगर कभी लौट सको, तो लौट आना,
मुश्किल है अब इस दिल को समझाना...
क्योंकि मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ,
जहाँ से हम अलग हुए थे...॥
अमित कुमार वंशी
गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025
मिट्टी से मेरा नाता है
मिट्टी से मेरा नाता है,
धरती माँ से रिश्ता पुराना,
बीज में जीवन बोता हूँ,
हर मौसम से करता बहाना।
मैं कोई बड़ा डॉक्टर नहीं,
पर खेत मेरा अस्पताल है,
जहाँ रोग नहीं इंसानों के,
फसल का हर हाल-बेहाल है।
मैं "कृषि चिकित्सक" कहलाता,
किसानों का हूँ साथी सच्चा,
दवा नहीं यहाँ प्रेम बाँटता,
हर पौधे से रखता नाता अच्छा।
बूढ़े बाबा की आँखों में मेहनत,
युवा किसान की आँखों में जोश,
दोनों में देखूँ भारत का चेहरा,
जिसमें बसता हर रोज़ विश्वास।
धरती का सीना चीर के बोता,
और फिर अन्न का पर्व मनाता,
ऐ मेरे किसान भाई सुन लो,
तुम ही देश का भगवान कहलाता।
जब खेत हँसे तो मन मुस्काए,
जब फसल लहराए तो गीत गाऊँ,
हर गाँव में खुशहाली फैले,
यही सपना मैं हर दिन बो जाऊँ।
अमित कुमार वंशी
सोमवार, 20 अक्टूबर 2025
पहली दफा घर से दूर दीवाली
आज हर घर-घर दीवाली है…
पर इस बार मुझे अधूरी सी लगती है,
रोशनी तो है चारों ओर हमारे आस पास,
पर मन में एक हल्की सी अंधियारी लगती है।
पहली बार हूं आज मै घर से दूर,
ना दादी की आवाज़, ना दादा का वो शोर,
ना आंगन में रंगोली बनाने की कोई बेचैनी,
ना दीयों की लौ से घर आंगन सजाने का होर।
याद आते हैं वो बीते सारे पल सुनहरे,
जब सब मिलकर सजाते थे घर आंगन के घेरें,
मां के हाथों के वो अनेकों पकवान की खुशबू,
और भाई-बहनों की हँसी में बसी खुशी के फेरे।
दोस्तों संग पटाखों की रौनक और भाग दौर,
पर आज बस यादें हैं, और मन में अजीब शोर
फिर भी मन कहता है खुद से खुद के लिए
दीवाली तो दिल में जलने वाली रौशनी है,
जहां परिवार की दुआ रहे और बढ़े प्रगति की ओर
दूर रहकर भी आज यही कामना है उससे हमारी
हर घर, हर दिल यूं ही रोशनी से जगमगाता रहे,
और मेरा प्यार, मेरी याद वहां तक पहुंच जाए
जो हमें महसूस कर दूर से बधाई दे इस दिवाली ।
अमित कुमार वंशी
गुरुवार, 25 सितंबर 2025
एक विद्यार्थी की व्यथा
किताबों के संग बिताए है ,
ज़िन्दगी के कितने साल,
हर लफ़्ज़ को पूजा समझा,
हर पन्ना था मेरे लिए कमाल।
सुबह से शाम तक पड़ता रहा ,
सपनों को रंगीन बनाता रहा,
उम्मीद थी एक उजली सुबह की,
पर हर मोड़ पर अंधेरा ही पाता रहा।
डिग्रियां तो दीवार पे सजी हैं,
पर जेबें आज भी खाली हैं,
सपने तो हैं मगर टूट चुके,
उम्मीदें भी अब सवालों में पली हैं।
जो मेहनत हमने किया निरन्तर,
उसका फल अबतक क्यों नहीं आया?
क्यों हालात ने मेरा मज़ाक उड़ाया,
क्यों किस्मत ने ऐसा दिन दिखाया?
आज वही साथी, जो कभी पढ़ाई छोड़ गए,
रोज़गार के रास्तों में आगे निकल गए।
मैं अबतक किताबों में डूबा रहा,
वो जीवन में खुशियां चुन गए।
पर फिर भी मेरा ये दिल कहता है,
हारना नहीं, निरंतर चलते रहना है,
सपनों की राहें है कठिन सही,
मगर उम्मीद को जलते रहना है।
क्योंकि मंज़िल देर से ही सही,
मगर मेहनत का एक दिन सम्मान होगा,
मेरी तपस्या का हर एक आंसु
एक दिन इंसाफ़ का जरूर प्रमाण होगा।
अमित कुमार वंशी
रविवार, 14 सितंबर 2025
हिंदी दिवस
आज हिंदी दिवस है,
हर कोई शान से लिखता है,
कविता, शायरी और गजल,
भाषा का मान बढ़ता है प्रवल।
जब बीत जाता आज का पल
कल करे कोई फिर यही पहल
तो कुछ चेहरे अनसुने करते हैं,
कान खुद-ब-खुद बहरे हो जाते हैं।
सिर्फ किताबों के पन्नों पर ही
ये शब्दों का मान रह जाता है,
मंच पर उभरने का सपना
अक्सर बेमान ही रह जाता है।
हम रचनाकार भी तो इंसान है,
सिर्फ सम्मान की आस लगाए बैठे है,
हमारी कविता में खुदकी एहसास हैं,
शब्दों में हमारी आत्मा की धुन है।
हां है सम्मान यहां भी कुछ के नाम
चाहे करे बड़ा या छोटा रचनात्मक काम
जो अक्सर दूसरों को मौका नहीं देते,
उभरते स्वर दबाकर अपनी झंडा गाड़ते।
क्यों वो भूल जाते है अक्सर कि
एक दिन हर पेड़ कभी बीज ही था,
यहां जन्मे हर रचनाकार कभी
संकोच से भरा नवसीखिया ही था।
आओ, मंच बाँटें, सबको मौका दें,
हर एक एक कलम को खुलने दें,
हिंदी तभी पूरी जग में महान बनेगी
जब हर किसी को यहां सम्मान मिलेगी।
अमित कुमार वंशी
गुरुवार, 14 अगस्त 2025
लीची अनुसंधान कैम्पस
यहां सिर्फ हरि भरी पेड़ नहीं,
हर शाखा पर टंगे बरे-बारे सपने है ।
यहां मेहनत और प्रकृति मिलकर,
अक्सर कई नई-नई कहानी गढ़ते है ।
फल फूलों की मिठास हवा में
इस संस्थान की यही खुबसूरती है ।
चार दिवारी से निकलते ही जब
सूरज की पहली किरण दिखती है
साथ मे पंछियों की चहचहाहट भी
जब हर सुबह का स्वागत करती है ,
मानो प्राकृतिक अपने स्वर में गाती है ।
यहां की यहीं सब पल दिल को भाती है।
संघर्ष और धैर्य यहां वैज्ञानिक से सिखा
असफल होकर पुनः प्रयास करते देखा ।
मधुर स्वर में बाते करते और कुछ समझाते
लीची के मिठास सा खुद के प्रति लुभाते देखा।
ज्ञान विज्ञान के जुड़कर यहां बहुत कुछ सिखा
कभी लीची फल चखा तो कभी लीची रस चखा।
यहां हर एक-एक फल में मीठा विज्ञान लिपटा है
मिट्टी से मिठास तक संस्थान एक कहानी गढ़ता है।
अमित कुमार वंशी
शनिवार, 26 जुलाई 2025
बेरोजगार की हुंकार
मत करो तुम अत्याचार,
हम हैं अभी बेरोज़गार।
खुद को कर रहे हैं तैयार,
लेकिन अभी हैं हम बेरोज़गार,
सहकर ताने हो रहे होशियार।
तपकर हम इस बवंडर में अभी,
बढ़ा रहे अपनी शक्ति और संस्कार।
बढ़ रहे कल्याण की दिशा में निरंतर,
कर रहा स्थिरता का जीवन में प्रहार।
दिन-रात मेहनत की भट्टी में जलते हैं,
पर चंद नंबरों से हम पीछे रहते हैं।
यह अंकों का फ़ासला कोई नहीं समझेगा,
ज़माना तो बस सफ़लता का दिन गिनेगा।
जो कल तक हमसे ही लेते थे हर पल सलाह,
कामयाब होकर आज वो ही दिखा रहे हमें राह।
वक़्त बदलते ही उनका भी बदलने लगा है अंदाज़,
पर ख़ामोश रहकर हम भी रच रहे हैं नया इतिहास।
सुनो वक़्त के थपेड़ों तुम भी,
यह ख़ामोशी नहीं है हमारी हार।
कठिन तपस्या का दौर है ये,
बस कुछ ही दिनों का है इंतज़ार।
नसीब बदलेगा, ये मंज़र बदलेगा,
मेहनत से चमकेगा अपना संसार।
आज भले ही हैं हम ख़ामोश,
कल गूंजेगी हमारी भी जय-जयकार!
अमित कुमार वंशी
मंगलवार, 22 जुलाई 2025
कुछ रिश्ते अक्सर भुलाए नहीं जाते
गुरुवार, 17 जुलाई 2025
तुझे पाना चाहा
हमने अक्सर तुमसे बेहतर नहीं
सिर्फ तुम्हे ही अपनाना चाहा।
हर मोर पर साथ तेरे बिताना चाहा
हंसकर, रोकर, गाकर, सिर्फ सामने तेरे
वो साड़ी पल को साथ निभाना चाहा ।
देखकर तेरी मुस्कान अक्सर झूमना
प्रवाह नहीं मुझे दुनियां के तामासे की
मुझे सिर्फ तुम हक दो तो तुझे चूमना
खुश हूँ तुम तक बस मुझे और नहीं ढूंढना ।
बस डर है मुझे तेरे बदनामी का नही तो मै
अपनी दिल में दबाए वो बात खुल्याम कर दूं ,
दो आजादी तो प्यार का ऐलान सरेआम कर दूं ,
आजीवन तेरे होकर मै अपना जीवन बीता दूं ।
तुम जैसे हो वैसे ही हरदम रहना, चाहो तो संवरना
प्रेम सिर्फ तुझसे है और न मुझे तुझसे कुछ कहना।
पवित्र रिश्तों में बंधक संग हंसना, गाना और झूमना
तुम बेहतर हो, बस मुझे तेरे संग आजीवन रहना।।
अमित कुमार वंशी
गुरुवार, 26 जून 2025
रो मत,जाने दे
अब रो मत जाने दे
रो मत , जी लिया मै जिंदगी अपनी ।मत रोक मुझे , जाना है अब जाने दे ।।
पा लिया है सब कुछ,अब बचा क्या है?
भर गया है अब जी मेरा ,अब जाने दे ।।
अब क्यों रहे बोझ बनकर इस जग में ?
रोना वहां जहां जन्म लेते ही मर जाता है,
जो जिंदगी का मजा भी नहीं ले पाता है ।।
तुम रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी ,
मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे ।।
चाहता नहीं बोझ बनकर जीना यहां ,
अपने कारण कष्ट किसी दूसरे को देना ।
नहीं भा रहा मुझे भी परे-परे सोना ।।
तुम रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी
मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे ।।
अब भा रहा मुझे जग छोड़ के जाना ,
माना किया है बहुत तुम शेवा मेरा –
पर कहा भी है कि बहुत ये पेर रहा
बोझ बनकर मेरा भी समय ये ले रहा
हा तुमने कहा है,फिर क्यों तुम सब रो रहा
अब रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी
मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे ।।
रहता मौत हाथ मेरे तो न देता कष्ट तुझे
रहता नहीं यहां मै दिन–रात परे परे ,
चला जाता कब ही इस जग को छोड़ के ।
अब क्यों रोते हो इस हालत में देख के ।।
तुम रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी
मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे।।
अमित कुमार वंशी
गुरुवार, 10 अप्रैल 2025
छोड़ मुझे बेहतर पाना
छोड़ मुझे खुश रहना,पर मुझसे बेहतर पाना
जो सह सके तेरे नखरे,जो रह सके आजीवन तेरे
अपने दुःख को भूल कर , पहले दुःख तेरे निवारे
उफ की आवाज सुन वो, पास तेरे दौरे आवे
हमसे हुए कमी भी वो पूरी कर,तेरे मन को भावे
बुलंदियों को चुमती हुई, बढ़ रही हो लगातार
बढ़ते जाओ, कुछ बेहतर पाओ, मान बढ़ाओ
इस पल में वह खुद की वाह वाही न लूट कर
जो दे तेरे सभी असफलता मे,अपना पूरा साथ
भर कर बाहों में वो तुझे , दिलाए पूरा विश्वाश
तुम फिर लेकर आस,करो मुसीबत से विजई प्राप्त
मै देखूं अंजान राही बन,जब हाथ पकड़ तुझे घुमाए
पगडंडी पर तुझे चलाए और खुद झाड़ी से टकराए
वह छन देख मेरा मन तुझे नही पारकर भी इतराएगा
खुद को समझा कर, छोड़ बीते पल को मेरा भी मन
अब एक नया जीवन मे तुझे देख भूलना चाहेगा ।।
कभी हो संयोग से आमने सामने तो खुद को छुपाऊ
बनकर आईना मै देखूं अक्सर, पर मै न नजर आऊ
मन दुःखी है, क्रोधित है खोकर पर मै कैसे बतलाऊं
पर तुम खुश है संग उसके , यह देख मै इतराऊं ।।
अमित कुमार वंशी
क्या यही है वो देश जिसकी हमने तमन्ना की थी?
1. बेबसी और तानाशाही का साया जहाँ कानून की आँख पर पट्टी नहीं, बस खामोशी का पहरा है, जहाँ सत्ता की ज़िद के आगे, हर आम आदमी का ज़ख्म गहरा है।...
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स्मृतियों की धुंधली गलियों में, जब अतीत उतरकर आता है, बाबा! आपका स्नेहिल चेहरा मन के दीप जलाता है। याद है मुझे वह स्वर अब भी, जिसमें अपनापन ...
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आज हिंदी दिवस है, हर कोई शान से लिखता है, कविता, शायरी और गजल, भाषा का मान बढ़ता है प्रवल। जब बीत जाता आज का पल कल करे कोई फिर यही पहल तो ...
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यहां सिर्फ हरि भरी पेड़ नहीं, हर शाखा पर टंगे बरे-बारे सपने है । यहां मेहनत और प्रकृति मिलकर, अक्सर कई नई-नई कहानी गढ़ते है । फल फूलों की मि...









