शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

क्या यही है वो देश जिसकी हमने तमन्ना की थी?



1.बेबसी और तानाशाही का साया 

जहाँ कानून की आँख पर पट्टी नहीं, बस खामोशी का पहरा है,

जहाँ सत्ता की ज़िद के आगे, हर आम आदमी का ज़ख्म गहरा है।

चाहे कितना भी घिनौना गुनाह कर दे कोई रसूखदार,

उसके सिर पर हाथ है आका का, नहीं होती कोई गिरफ्तारी या वार।

हम किसी पार्टी के अंधभक्त नहीं, हम तो देश हित की बात करते हैं,

पर जब भी पूछते हैं सवाल, हम पर 'देशद्रोही' के ठप्पे जड़े जाते हैं।

हमारी निष्ठा को बाहरी साज़िश बताकर अफवाहें फैलाई जाती हैं,

या तो सलाखों के पीछे डाला जाता है, या फिर हमारी सांसें छीन ली जाती हैं।

2.धर्म और जाति का घिनौना बाजार 

जहाँ वोटों की खातिर भाइयों के बीच दीवारें खींची जाती हैं,

धर्म और जाति के नाम पर नफ़रत की आग सुलगवाई जाती है।

खुद को 'धर्म रक्षक' बताने वाले नेता जब गद्दी पर बैठ जाते हैं,

तो धर्मस्थलों के घोटालों पर होंठों को सी लेते हैं, चुप हो जाते हैं।

दूसरों के बच्चों को जो दंगे करने की राह दिखाते हैं,

उन्हीं के अपने बच्चे दूसरे धर्म में ब्याह रचाते हैं।

अंधभक्त भी गूंगे बनकर देखते रहते हैं यह सारा तमाशा,

और जब कानून का डंडा पड़ता है, तो नेता झाड़ लेते हैं अपना दामन और आशा।

3.एम्बुलेंस बनाम काफिला (V.I.P संस्कृति)

जिस देश में सड़क पर एम्बुलेंस में तड़प रहा हो कोई लाचार,

उसकी टूटती साँसों से ज़्यादा कीमती होता है नेता का गुबार।

रास्ता रोक दिया जाता है, सायरन की गूँज में चीखें दब जाती हैं,

क्योंकि साहिब का काफिला गुज़रना है, आम जान की क्या बिसात रह जाती है!

एक बार चुनाव जीत गए तो पुश्तों का इंतज़ाम हो जाता है,

देश का खज़ाना लुटता है और उनका घर आबाद हो जाता है।

4.युवाओं का दर्द और पेपर लीक का दंश 

सालों-साल जो रात-दिन एक करके किताबों में आँखें फोड़ते हैं,

अपनी जवानी, अपनी खुशियाँ, माँ-बाप के सपने जोडते हैं।

पर चंद पैसों के खातिर परीक्षा के पर्चे बाज़ार में बिक जाते हैं,

साक्ष्य मिलने पर भी अफ़सर आँखे मूँदकर सबूत मिटाते हैं।

जब सड़कों पर उतरता है देश का युवा, हक माँगने के लिए,

तो मीडिया पूछती है—"क्या सब पढ़ने वाले ही आए हैं यहाँ लड़ने के लिए?"

शांतिपूर्ण अनशन पर लाठियाँ बरसती हैं, भीड़ में उपद्रवी मिलाए जाते हैं,

पथराव कराकर सच्चे आंदोलनों को 'बदनाम' घोषित किए जाते हैं।

5.मीडिया का ढोंग और अतीत के बहाने 

जब हम पूछते हैं आज के हुक्मरानों से उनका हिसाब,

तो वे कल की नाकामियों का थमा देते हैं हमें जवाब—

"तब कहाँ थे तुम, जब पहले भी ऐसा होता आया था?"

अरे! हम तब नादान थे, और इसीलिए तो तुम्हें चुनकर लाया था!

क्या सवाल पूछना गुनाह है? क्या चुप रहना ही देशभक्ति है?

क्या संसद में सिर्फ नेताओं के फायदे की बात होना ही तरक्की है?

महंगाई की मार से कमर टूट रही, जनता दाने-दाने को तरसती है,

और सदन में नेता हित के बिलों पर तालियाँ गड़गड़ाती हैं।

6.उम्मीद की किरण और नया सवेरा 

पर याद रखो ऐ ज़ालिमों, यह देश किसी नेता की जागीर नहीं,

यह करोड़ों मासूमों के पसीने और शहीदों के खून की तस्वीर है।

आज नहीं तो कल, यह सोई हुई जनता जाग ही जाएगी,

तुम्हारी हर चालाकी, हर नफ़रत की साज़िश को पहचान जाएगी।

हम रोते हैं इस देश की हालत पर, क्योंकि हम इससे बेइंतहा प्यार करते हैं,

हम सिर झुकाकर अत्याचार सहने से, अब हर हाल में इनकार करते हैं।

उठेगा एक दिन ऐसा तूफ़ान, जो सच्चा सवेरा लाएगा,

यह भारत फिर से जनता का होगा, और भारत माँ का मस्तक मुस्कुराएगा!

                                                                     अमित कुमार वंशी                                                   





जनता कब तक चुप रहेगी?

यह कैसा देश बना दिया हमने,
जहाँ सत्ता ही कानून हो गई,
कुर्सी पर बैठा कोई नेता
तो हर गलती माफ़ हो गई।

हत्या हो, बलात्कार हो,
तानाशाही का राज हो,
कानून उसके घर की चौखट पर
क्यों इतना बेबस आज हो?

नेता हो या उसका परिवार,
क्यों कोई उन्हें छू नहीं पाता?
कितना भी घिनौना अपराध हो,
सिस्टम क्यों आँखें मूँद जाता?

हम किसी दल के अंधभक्त नहीं,
हम देशहित की बात करते हैं,
पर सत्ता से सवाल पूछें तो
देशद्रोही कहलाते हैं।

कभी फंडिंग विदेशी बतलाते,
कभी देश बेचने का इल्ज़ाम,
सच बोलने वालों के हिस्से
क्यों आता है जेल और बदनाम?

कभी परिवार को निशाना बनाते,
कभी जान से मार दिया जाता,
डर के मारे सच बोलने वाला
आखिर चुप हो ही जाता।

जब घर पर संकट आता है,
तब विपक्ष दरवाज़े पर आता है,
मदद के नाम पर तस्वीर खिंचाकर
अपना चेहरा चमकाता है।

पर जब संकट शुरू हुआ था,
तब उनकी चौखट तक जाने नहीं दिया,
मदद के लिए जो हाथ बढ़ाया,
उसे रास्ते में ही रोक दिया।

यह कैसी राजनीति है देश में,
जहाँ दर्द भी अवसर बन जाता है?
जनता का आँसू सूखने से पहले
नेता का पोस्टर छप जाता है।

जाति के नाम पर वोट माँगते,
धर्म के नाम पर आग लगाते,
एक-दूसरे के खिलाफ़ भड़काकर
खुद को धर्मरक्षक कहलाते।

किसी के हाथ में पत्थर देकर
किसी के दिल में नफ़रत भरते,
फिर उसी भीड़ के मरने पर
चुपचाप किनारे खड़े रहते।

अपने घर में धर्म की दीवारें
क्यों अचानक टूट जाती हैं?
पर जनता के बीच वही दीवारें
क्यों तलवारें बन जाती हैं?

सवाल करो तो मौन खड़े हैं,
जैसे सबके हों होंठ सिले,
धर्म के नाम पर लड़ने वाले
क्यों नेता के आगे चुप मिले?

जो भीड़ को आगे करते हैं,
वही संकट में दूर हो जाते हैं,
और जिनके लिए लोग लड़ते हैं,
वही उन्हें पहचानने से मुकर जाते हैं।

यह कैसा देश बना दिया हमने,
जहाँ एम्बुलेंस रुक जाती है,
पर नेता का काफिला आते ही
पूरी सड़क झुक जाती है।

जिस सड़क पर किसी की साँसें
जीवन के लिए लड़ती हैं,
वहीं सत्ता की गाड़ियों के आगे
जनता की धड़कनें मरती हैं।

एक बार कुर्सी मिल जाए तो
दो-तीन पीढ़ियाँ खा जाती हैं,
जनता की मेहनत से कमाई दौलत
नेताओं की तिजोरी भर जाती है।

भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी,
कि फल पीढ़ियों तक आता है,
जनता जीवन भर मेहनत करती,
नेता का परिवार बैठकर खाता है।

और जब युवा परीक्षा देता है,
तो उसकी मेहनत बिक जाती है,
कहीं पेपर पहले ही बिकता है,
कहीं उसकी उम्मीद लीक हो जाती है।

प्रूफ मिलते हैं, सबूत मिलते हैं,
फिर भी कार्रवाई नहीं होती,
जब तक जनता सड़क पर न उतरे
तब तक सरकार क्यों नहीं जागती?

धरना हो, प्रदर्शन हो,
जब आवाज़ बहुत बढ़ जाती है,
तब जाँच की एक टीम बनाकर
फाइल किसी कोने में सो जाती है।

कभी किसी गरीब को पैसे देकर
दोष अपने सिर लेने को कहते हैं,
और असली गुनहगार सत्ता की छाया में
आज भी सुरक्षित रहते हैं।

जाँच कब पूरी होगी—
किसी को कुछ मालूम नहीं,
मुद्दा कब दबा दिया जाएगा—
इसका भी कोई हिसाब नहीं।

और जब लाखों युवा
भूखे-प्यासे बैठ जाते हैं,
तो कुछ मीडिया हँसकर पूछता है—
“क्या सब परीक्षा देने वाले हैं?”

“बाकी लोग तो पढ़ रहे हैं,
तुम क्यों सड़क पर आए हो?”
अरे, जिनका भविष्य लूटा गया,
उन्हें ही दोषी क्यों ठहराए हो?

हम पूछते हैं उन लोगों से,
जो सवालों से घबराते हैं—
क्या देशहित यही है कि
देश में कुछ भी हो और लोग चुप रह जाते हैं?

कहते हो—
“पहले वाली सरकार में क्या हुआ था?”
हम तब छोटे थे,
शायद समझ नहीं थी,
शायद आवाज़ नहीं थी,
शायद हमें बोलने का अधिकार ही नहीं था।

और अगर पहले गलत हुआ था,
तो तुम्हें चुना क्यों गया था?
क्या इसलिए कि तुम भी वही करोगे
जिसके खिलाफ़ तुमने हमें जगाया था?

सत्ता बदलने का मतलब क्या
सिर्फ़ चेहरा बदलना है?
या फिर जनता की उम्मीदों को
फिर से धोखा देना है?

शांतिपूर्ण अनशन हो तो
लाठियाँ क्यों बरसती हैं?
जो अपने हक़ के लिए बैठे हों,
उन पर पुलिस क्यों टूट पड़ती है?

कभी भीड़ में कुछ लोग आकर
पत्थर और हिंसा फैलाते हैं,
फिर शांत बैठे लोगों के माथे
उसी हिंसा का कलंक लगाते हैं।

कौन थे वे?
किसके इशारे पर आए थे?
क्यों हर बार शांत आंदोलन को
हिंसा के नाम पर बदनाम कराए थे?

क्योंकि सत्ता को बस चाहिए
एक बहाना—एक इल्ज़ाम,
फिर जनता पर कार्रवाई हो जाए
और दब जाए सारा सवाल।

पक्ष हो या विपक्ष हो,
सदन में नेता ही नेता हैं,
जनता के सवाल पीछे खड़े,
कुर्सी के सवाल आगे हैं।

महँगाई बढ़ती जाती है,
बेरोज़गारी घर में आती है,
पर सदन में जनता से ज्यादा
नेताओं की कुर्सी बचाई जाती है।

बिल पास होते जाते हैं,
बहसें होती जाती हैं,
पर आम आदमी की आवाज़
फाइलों में दबती जाती है।

कभी-कभी लगता है सचमुच
देश फिर गुलाम हो गया है—
विदेशी हाथों से नहीं,
अपने ही नेताओं के हाथों हो गया है।

फर्क बस इतना है—
तब जंजीरें दिखाई देती थीं,
आज जंजीरें दिखाई नहीं देतीं,
क्योंकि उन्हें जाति, धर्म,
नफ़रत और झूठ के नाम पर पहनाया जाता है।

जनता को जनता से लड़ाकर
सत्ता अपनी कुर्सी बचाती है,
और जब जनता सवाल पूछती है
तो उसे देशभक्ति सिखाती है।

पर याद रखना, ऐ सत्ता के मालिकों,
जनता हमेशा मूर्ख नहीं रहती,
जो आज तुम्हारी चालों में उलझी है,
वह कल सब समझ सकती है।

आज जो नफ़रत बो रहे हो,
कल उसका हिसाब होगा,
आज जो जनता को बाँट रहे हो,
कल वही जनता जवाब होगी।

जनता ने तुम्हें देश चलाने को
अपना प्रतिनिधि बनाया है,
अपना साम्राज्य बनाने को नहीं,
अपना परिवार पालने को नहीं।

कुर्सी जनता की अमानत है,
इसे अपनी जागीर मत समझो,
जनता को कमजोर और बेवकूफ
बार-बार मत समझो।

क्योंकि एक दिन—
न जाति काम आएगी,
न धर्म का नारा,
न झूठी देशभक्ति,
न भीड़ का सहारा।

उस दिन जनता पूछेगी—
“हमने तुम्हें चुना था देश के लिए,
तुमने देश को क्यों बाँटा?”

“हमने तुम्हें चुना था न्याय के लिए,
तुमने न्याय को क्यों बेचा?”

“हमने तुम्हें चुना था विकास के लिए,
तुमने अपना घर क्यों भरा?”

“हमने तुम्हें चुना था जनता के लिए,
तुमने जनता को ही क्यों डराया?”

और उस दिन
न कोई अंधभक्त होगा,
न कोई अंधविरोधी,
सिर्फ़ एक सवाल होगा—

क्या यह देश नेताओं का है?

नहीं!

यह देश जनता का है।

और जब जनता जागेगी,
तो नफ़रत की दीवारें गिरेंगी,
झूठे नारों की आवाज़ दबेगी,
सवालों की आवाज़ उठेगी।

क्योंकि लोकतंत्र में
चुप रहना हमेशा शांति नहीं होता—
कभी-कभी चुप्पी
तानाशाही की सबसे बड़ी ताकत होती है।

इसलिए सवाल पूछो,
पर सच के साथ पूछो।

विरोध करो,
पर हिंसा के बिना करो।

नेता को नेता समझो,
भगवान मत बनाओ।

पार्टी को पार्टी समझो,
देश मत बनाओ।

और याद रखो—

देश किसी नेता से बड़ा है,
जनता किसी पार्टी से बड़ी है,
और संविधान किसी कुर्सी से बड़ा है।

आज नहीं तो कल,
जनता सब समझ जाएगी।

और जिस दिन जनता ने
डर से ऊपर उठकर सवाल पूछ लिया—

उस दिन सत्ता को
जनता के सामने
जवाब देना ही पड़ेगा।

क्योंकि लोकतंत्र में
जनता चुप हो सकती है,
पर हमेशा के लिए
सोई नहीं रह सकती। 

                             अमित कुमार वंशी                                            


गुरुवार, 16 जुलाई 2026

बाबा के सिरहाने रखे कुछ रुपये

स्मृतियों की धुंधली गलियों में, जब अतीत उतरकर आता है,

बाबा! आपका स्नेहिल चेहरा मन के दीप जलाता है।


याद है मुझे वह स्वर अब भी, जिसमें अपनापन बहता था—

“वंशी, पैसे ले लेना बेटा, सिरहाने के पास रखा है।”


“जितना खर्च लगे, ले लेना, मन में संकोच न लाना,

पैसों के कारण, मेरे बच्चे, कभी कोई कष्ट न पाना।”


कितने साधारण थे वे शब्द,पर अर्थ अनन्त समाया था,

मेरे हर छोटे-से सपने में आपका हृदय समाया था।


न प्रश्न किया—कहाँ खर्च होंगे? न कोई लेखा माँगा था,

मेरे ऊपर विश्वास आपका ईश्वर से भी ऊँचा था।


आपने रुपये नहीं दिए थे, आपने राह दिखाई थी,

मेरी आँखों के हर सपने में अपनी नींद गँवाई थी।


जब भी कोई कठिनाई आई, जब भी मन घबराया था,

आपके शब्दों ने चुपके से मुझको फिर संभाला था।


अब भी जब मैं राहों पर हूँ, जब मंज़िल दूर दिखाई देती,

आपकी आवाज़ भीतर से कहती “वंशी, चिंता मत करना…

पैसों से कोई दिक्कत नहीं होगी।”


पर बाबा…अब सिरहाने के पास वो रुपये रखे नहीं मिलते,

आपको पुकारूँ तो आप लौटकर आते नहीं मिलते।


घर वही है, आँगन वही है, वही पुरानी दीवारें हैं,

पर आपकी आवाज़ के बिना सब सूनी-सूनी राहें हैं।


कभी मन करता है लौटकर आपके चरणों में बैठ जाऊँ,

कह दूँ— “बाबा, पैसे चाहिए…”और बचपन-सा मुस्काऊँ।


आप फिर कहते—“ले लो वंशी, जितना लगे ले लेना,

बस पैसों के कारण अपने सपनों को मत रोक देना।”


काश समय फिर लौट सके, काश वो दिन फिर आ जाए,

काश बाबा की एक पुकार फिर मेरे कानों तक आ जाए।


पर समय की कठोर धारा पीछे मुड़कर आती नहीं,

बाबा की प्यारी छाया फिर आँखों से जाती नहीं।


आज समझ पाया हूँ बाबा—वो रुपये केवल रुपये न थे,

वे आपकी तपती हथेली के स्नेह-सिक्त आँसू थे।


वे मेरी राहों की पूँजी थे, वे मेरे सपनों का मान थे,

वे मेरे जीवन के अंधेरों में आपके जलते दीप समान थे।


आज भले ही हाथों में आपके दिए रुपये नहीं हैं,

पर बाबा, आपकी दी हुई हिम्मत आज भी मुझसे दूर नहीं है।


मैं जब भी टूटता हूँ भीतर, आप मुझे संभाल लेते हैं,

यादों के उस पुराने घर से चुपके से मुस्कुरा देते हैं।


और मैं फिर उठ खड़ा होता हूँ, फिर संघर्षों से लड़ता हूँ,

क्योंकि मैं केवल वंशी नहीं—आपका वंशी हूँ, बाबा!


जिस दिन मेरी मंज़िल होगी, जिस दिन सपने साकार होंगे,

उस दिन सबसे पहले बाबा, आँसू मेरे तैयार होंगे।


आकाश की ओर देखकर कहूँगा—

“बाबा, देखिए… आपका वंशी आया है,

आपके दिए हुए विश्वास ने आज मुझे यहाँ पहुँचाया है।”


आप दूर सही, पर पास हैं बाबा, मेरी हर धड़कन में रहते हैं,

सिरहाने के पास रखे रुपयों से कहीं अधिक 

आप मेरी आत्मा में रहते हैं।


और आज भी, जब जिंदगी मुझे डराती है,

आपकी आवाज़ भीतर से आती है—

“वंशी…जितना खर्च लगे, ले लेना,

पैसों के कारण कोई दिक्कत नहीं होना चाहिए…”


बाबा…पैसे तो अब सिरहाने के पास नहीं हैं,

पर आपका आशीर्वाद आज भी सिरहाने रखा है।

और शायद इसी कारण आपका वंशी आज भी

कभी भी किसी मोड़ पर हारना सिखा नहीं  है । 





रविवार, 14 जून 2026

अन्नदाता किसान

 कभी सूखा, कभी बाढ़ का प्रहार सहता है,

फिर भी हर सुबह उम्मीदों के संग रहता है।

हिम्मत को अपना साथी बनाकर चल पड़ता है,

खेत-खलिहानों में दिन-रात पसीना बहाता है।


तपती दोपहरी हो या ठिठुरती रात,

धरती माँ की सेवा में रहता है हर बार।

जग को देता शुद्ध अन्न हर एक पल,

खुद रुखी-सुखी रोटी से करता है गुज़र-बसर।


जिसके मैले कपड़ों से लोग घृणा करते हैं,

उसी के श्रम से थालियाँ स्वाद से भरते हैं।

उसके तन की पसीने की गंध जो तुम्हें खलती है,

वही खुशबू बनकर तेरी थाली में चावल महकाती है।


विविध व्यंजनों से जब सजी होती है तेरी थाली,

याद रखना उसमें बसी है किसान की मेहनत निराली।

करो सम्मान उसका, हे मानव! सदा सिर झुकाकर,

उसके बिना जीवन अधूरा है, यह सत्य अपनाकर।


हारकर भी प्रकृति से वह बार-बार लड़ जाता है,

टूटे सपनों को फिर आशाओं से जोड़ जाता है।

कई रातें भूखा सो जाता है मायूस होकर,

लेकिन जग को देता है हर संसाधन हँसकर।


वह धरती का सच्चा वीर, राष्ट्र की शान है,

उसके श्रम से ही हर घर में मुस्कान है।

नमन करो उस अन्नदाता को बारम्बार,

जिसके कारण जीवन में है खुशियों का संसार। 

                                  अमित कुमार वंशी                         





शनिवार, 30 मई 2026

तुम लौट आना

ओ मेरी चाहत, ओ मेरी जान,

मैं आज भी हूँ वहीं पर हैरान।

उसी मोड़ पर खड़ा हूँ अकेला,

जहाँ छूटा था यादों का मेला।


कटते हैं दिन अब तो रोते-रुलाते,

रातें गुज़रती हैं तुमको बुलाते।

तेरे सिवा कोई भाता नहीं है,

दिल और कहीं दिल लगाता नहीं है।


सोचूँ किसी का जो होने की बात,

काँप उठती है रूह, ठहरते हैं जज़्बात।

मंजूर है तन्हा जीवन बिताना,

पर गैर के संग खुशियाँ मनाना...

अब इस दिल को गवारा नहीं है,

तेरे बिना कोई हमारा नहीं है।


माना कि तुममें भी थीं कुछ कमियाँ,

पर तुम ही तो थीं मेरी इन आँखों की नमियाँ।

आने से पहले जो ज़िन्दगी थी मेरी,

अब लौट पाऊँ, वो ताकत नहीं है मेरी।


तुम आईं, आदत बनीं, अपना बनाया,

फिर क्यों अंधेरों में मुझको सुलाया?

समझूँ मैं तुमको कोई दर्द या सपना,

जो भी थीं तुम, पर थीं तो अपना।


रहती अगर तुम उम्र भर हमारे,

हँसकर सहते हम दर्द ये सारे।

पर कुछ पलों का ये जो अधूरापन है,

घुटता इसी में अब मेरा ये मन है।


संसार में वैसे तो सबकुछ सजा है,

पर तेरे बिना हर एक लम्हा बेमज़ा है।

जैसे बिना स्वाद का कोई व्यंजन हो,

या बिन धड़कन का बेजान कोई तन हो।


ओ मेरी उल्फ़त, ओ मेरी जान,

खोया हुआ है मेरा जहान।

अगर कभी लौट सको, तो लौट आना,

मुश्किल है अब इस दिल को समझाना...

क्योंकि मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ,

जहाँ से हम अलग हुए थे...॥


                       अमित कुमार वंशी                     



गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

मिट्टी से मेरा नाता है

 मिट्टी से मेरा नाता है,

धरती माँ से रिश्ता पुराना,

बीज में जीवन बोता हूँ,

हर मौसम से करता बहाना।


मैं कोई बड़ा डॉक्टर नहीं,

पर खेत मेरा अस्पताल है,

जहाँ रोग नहीं इंसानों के,

फसल का हर हाल-बेहाल है।


मैं "कृषि चिकित्सक" कहलाता,

किसानों का हूँ साथी सच्चा,

दवा नहीं यहाँ प्रेम बाँटता,

हर पौधे से रखता नाता अच्छा।


बूढ़े बाबा की आँखों में मेहनत,

युवा किसान की आँखों में जोश,

दोनों में देखूँ भारत का चेहरा,

जिसमें बसता हर रोज़ विश्वास।


धरती का सीना चीर के बोता,

और फिर अन्न का पर्व मनाता,

ऐ मेरे किसान भाई सुन लो,

तुम ही देश का भगवान कहलाता।


जब खेत हँसे तो मन मुस्काए,

जब फसल लहराए तो गीत गाऊँ,

हर गाँव में खुशहाली फैले,

यही सपना मैं हर दिन बो जाऊँ।

                          अमित कुमार वंशी                                     




सोमवार, 20 अक्टूबर 2025

पहली दफा घर से दूर दीवाली

आज हर घर-घर दीवाली है…

पर इस बार मुझे अधूरी सी लगती है,

रोशनी तो है चारों ओर हमारे आस पास,

पर मन में एक हल्की सी अंधियारी लगती है।


पहली बार हूं आज मै घर से दूर,

ना दादी की आवाज़, ना दादा का वो शोर,

ना आंगन में रंगोली बनाने की कोई बेचैनी,

ना दीयों की लौ से घर आंगन सजाने का होर।


याद आते हैं वो बीते सारे पल सुनहरे,

जब सब मिलकर सजाते थे घर आंगन के घेरें,

मां के हाथों के वो अनेकों पकवान की खुशबू,

और भाई-बहनों की हँसी में बसी खुशी के फेरे।


दोस्तों संग पटाखों की रौनक और भाग दौर,

पर आज बस यादें हैं, और मन में अजीब शोर 

फिर भी मन कहता है खुद से खुद के लिए

दीवाली तो दिल में जलने वाली रौशनी है,

जहां परिवार की दुआ रहे और बढ़े प्रगति की ओर 


दूर रहकर भी आज यही कामना है उससे हमारी 

हर घर, हर दिल यूं ही रोशनी से जगमगाता रहे,

और मेरा प्यार, मेरी याद वहां तक पहुंच जाए 

जो हमें महसूस कर दूर से बधाई दे  इस दिवाली ।



                               अमित कुमार वंशी                    


गुरुवार, 25 सितंबर 2025

एक विद्यार्थी की व्यथा

किताबों के संग बिताए है ,

ज़िन्दगी के कितने साल,

हर लफ़्ज़ को पूजा समझा,

हर पन्ना था मेरे लिए कमाल।


सुबह से शाम तक पड़ता रहा ,

सपनों को रंगीन बनाता रहा,

उम्मीद थी एक उजली सुबह की,

पर हर मोड़ पर अंधेरा ही पाता रहा।


डिग्रियां तो दीवार पे सजी हैं,

पर जेबें आज भी खाली हैं,

सपने तो हैं मगर टूट चुके,

उम्मीदें भी अब सवालों में पली हैं।


जो मेहनत हमने किया निरन्तर,

उसका फल अबतक क्यों नहीं आया?

क्यों हालात ने मेरा मज़ाक उड़ाया,

क्यों किस्मत ने ऐसा दिन दिखाया?


आज वही साथी, जो कभी पढ़ाई छोड़ गए,

रोज़गार के रास्तों में आगे निकल गए।

मैं अबतक किताबों में डूबा रहा,

वो जीवन में खुशियां चुन गए।


पर फिर भी मेरा ये दिल कहता है,

हारना नहीं, निरंतर चलते रहना है,

सपनों की राहें है कठिन सही,

मगर उम्मीद को जलते रहना है।


क्योंकि मंज़िल देर से ही सही,

मगर मेहनत का एक दिन सम्मान होगा,

मेरी तपस्या का हर एक आंसु 

एक दिन इंसाफ़ का जरूर प्रमाण होगा।

                             अमित कुमार वंशी                         


रविवार, 14 सितंबर 2025

हिंदी दिवस


आज हिंदी दिवस है,

हर कोई शान से लिखता है,

कविता, शायरी और गजल,

भाषा का मान बढ़ता है प्रवल।


जब बीत जाता आज का पल 

कल करे कोई फिर यही पहल 

तो कुछ चेहरे अनसुने करते हैं,

कान खुद-ब-खुद बहरे हो जाते हैं।


सिर्फ किताबों के पन्नों पर ही 

ये शब्दों का मान रह जाता है,

मंच पर उभरने का सपना

अक्सर बेमान ही रह जाता है।


हम रचनाकार भी तो इंसान है,

सिर्फ सम्मान की आस लगाए बैठे है,

हमारी कविता में खुदकी एहसास हैं,

शब्दों में हमारी आत्मा की  धुन है।


हां है सम्मान यहां भी कुछ के नाम 

चाहे करे बड़ा या छोटा रचनात्मक काम 

जो अक्सर दूसरों को मौका नहीं देते,

उभरते स्वर दबाकर अपनी झंडा गाड़ते।


क्यों वो भूल जाते है अक्सर कि

एक दिन हर पेड़ कभी बीज ही था,

यहां जन्मे हर रचनाकार कभी

संकोच से भरा नवसीखिया ही था।


आओ, मंच बाँटें, सबको मौका दें,

हर एक एक कलम को खुलने दें,

हिंदी तभी पूरी जग में महान बनेगी

जब हर किसी को यहां सम्मान मिलेगी।

                               अमित कुमार वंशी           



गुरुवार, 14 अगस्त 2025

लीची अनुसंधान कैम्पस

यहां सिर्फ हरि भरी पेड़ नहीं,

हर शाखा पर टंगे बरे-बारे सपने है ।

यहां मेहनत और प्रकृति मिलकर,

अक्सर कई नई-नई कहानी गढ़ते है ।

फल फूलों की मिठास हवा में  

इस संस्थान की यही खुबसूरती है ।


चार दिवारी से निकलते ही जब 

सूरज की पहली किरण दिखती है

साथ मे पंछियों की चहचहाहट भी 

जब हर सुबह का स्वागत करती है ,

मानो प्राकृतिक अपने स्वर में गाती है ।

यहां की यहीं सब पल दिल को भाती है।


संघर्ष और धैर्य यहां वैज्ञानिक से सिखा

असफल होकर पुनः प्रयास करते देखा ।

मधुर स्वर में बाते करते और कुछ समझाते 

लीची के मिठास सा खुद के प्रति लुभाते देखा।


ज्ञान विज्ञान के जुड़कर यहां बहुत कुछ सिखा

कभी लीची फल चखा तो कभी लीची रस चखा।

यहां हर एक-एक फल में मीठा विज्ञान लिपटा है  

मिट्टी से मिठास तक संस्थान एक कहानी गढ़ता है।

     

                                        अमित कुमार वंशी 



NRC लीची अनुसंधान मुजफ्फरपुर बिहार


शनिवार, 26 जुलाई 2025

बेरोजगार की हुंकार

मत करो तुम अत्याचार,

हम हैं अभी बेरोज़गार।

खुद को कर रहे हैं तैयार,

लेकिन अभी हैं हम बेरोज़गार,

सहकर ताने हो रहे होशियार।


तपकर हम इस बवंडर में अभी,

बढ़ा रहे अपनी शक्ति और संस्कार।

बढ़ रहे कल्याण की दिशा में निरंतर,

कर रहा स्थिरता का जीवन में प्रहार।


दिन-रात मेहनत की भट्टी में जलते हैं,

पर चंद नंबरों से हम पीछे रहते हैं।

यह अंकों का फ़ासला कोई नहीं समझेगा,

ज़माना तो बस सफ़लता का दिन गिनेगा।


जो कल तक हमसे ही लेते थे हर पल सलाह,

कामयाब होकर आज वो ही दिखा रहे हमें राह।

वक़्त बदलते ही उनका भी बदलने लगा है अंदाज़,

पर ख़ामोश रहकर हम भी रच रहे हैं नया इतिहास।


सुनो वक़्त के थपेड़ों तुम भी,

यह ख़ामोशी नहीं है हमारी हार।

कठिन तपस्या का दौर है ये,

बस कुछ ही दिनों का है इंतज़ार।


नसीब बदलेगा, ये मंज़र बदलेगा,

मेहनत से चमकेगा अपना संसार।

आज भले ही हैं हम ख़ामोश,

कल गूंजेगी हमारी भी जय-जयकार!


                            अमित कुमार वंशी                         


मंगलवार, 22 जुलाई 2025

कुछ रिश्ते अक्सर भुलाए नहीं जाते

कुछ रिश्ते अक्सर भुलाए नहीं जाते
पाकर या खोकर कभी बताए नहीं जाते 
संभाल कर रख अपने अंदर आजीवन 
किसी मोर पर मिलना तो कभी बिछड़ना 
अक्सर ये दर्द खुद के अंदर ही दबाएं जाते ।

कुछ किस्से बताए नहीं जाते किसी से भी 
तो कुछ कितना भी छुपाए छुप नहीं पाते 
याद कर उस पल को अक्सर मन घबराते 
कुछ रिश्ते अक्सर कभी भुलाए नहीं जाते।।

दूर होकर भी कुछ एहसास छोड़ जाते 
चाहे हालात और समय बदल जाते पर 
ये मन, और बीते बंधन संग रह जाते ।
थके पथिक सा छांव का एहसास दिलाते।
कुछ रिश्ते अक्सर भुलाए नहीं जाते ।।

गहराइयों में जाकर कुरेदता कभी कुछ छन 
तन्हाइयों में अक्सर ढूंढ़ता है उसे ये मन 
फिर थक हार कर पछताता है, पर क्या करे ?
आज भी उसे मुझसे नहीं  भूलाया जाता है ।।

कमी मुझमें थी या था कुछ पल का खिलौना 
कहती बचपना थी हमारी, अब संग न रहना ।
मुलाकात में बहकी साड़ी अंदाज उसकी थी।
मन से तन तक पूरी शुरुआत भी उसकी थी ।।

ये अनमोल रिश्ता मानकर अपनाया था हमने 
पर क्या पता था ये बस खेल बचपना की थी।।
कुछ पल संग खेलेगी फिर बहुत दूर धकेलेगी
हम बंध जाएंगे पूरी जीवन गंभीत रिश्तों में 
वो खिलौने बदलेगी उम्र के साथ जीवन मे ।।

किस्से बतलाए अपनी ये गलतियां जीवन की 
क्यों मजाक बनाए हम खुद ही खुद की 
बाते तो छुप जाती पर दुखी मन दिख जाता है ।
पाकर या खोकर कुछ रिश्ते बताए नहीं जाते।
कुछ रिश्ते अक्सर कभी भी भुलाए नहीं जाते।।

                                अमित कुमार वंशी 

गुरुवार, 17 जुलाई 2025

तुझे पाना चाहा

हमने अक्सर तुमसे बेहतर नहीं 

सिर्फ तुम्हे ही अपनाना चाहा।

हर मोर पर साथ तेरे बिताना चाहा 

हंसकर, रोकर, गाकर, सिर्फ सामने तेरे 

वो साड़ी पल को साथ निभाना चाहा ।


देखकर तेरी मुस्कान अक्सर झूमना 

प्रवाह नहीं मुझे दुनियां के तामासे की 

मुझे सिर्फ तुम हक दो तो तुझे चूमना 

खुश हूँ तुम तक बस मुझे और नहीं ढूंढना ।


बस डर है मुझे तेरे बदनामी का नही तो मै 

अपनी दिल में दबाए वो बात खुल्याम कर दूं ,

दो आजादी तो प्यार का ऐलान सरेआम कर दूं ,

आजीवन तेरे होकर मै अपना जीवन बीता दूं ।


तुम जैसे हो वैसे ही हरदम रहना, चाहो तो संवरना 

प्रेम सिर्फ तुझसे है और न मुझे तुझसे कुछ कहना।

पवित्र रिश्तों में बंधक संग हंसना, गाना और झूमना 

तुम बेहतर हो, बस मुझे तेरे संग आजीवन रहना।।


                                              अमित कुमार वंशी 




गुरुवार, 26 जून 2025

रो मत,जाने दे

   अब रो मत जाने दे     

रो मत , जी लिया मै जिंदगी अपनी ।

मत रोक मुझे , जाना है अब जाने दे ।।

पा लिया है सब कुछ,अब बचा क्या है?

भर गया है अब जी मेरा ,अब जाने दे ।।


अब क्यों रहे बोझ बनकर इस जग में ?

रोना वहां जहां जन्म लेते ही मर जाता है,

जो जिंदगी का मजा भी नहीं ले पाता है ।।

तुम रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी ,

मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे ।।


चाहता नहीं बोझ बनकर जीना यहां ,

अपने कारण कष्ट किसी दूसरे को देना ।

नहीं भा रहा मुझे भी परे-परे सोना ।।

तुम रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी 

मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे ।।


अब भा रहा मुझे जग छोड़ के जाना ,

माना किया है बहुत तुम शेवा मेरा –

 पर कहा भी है कि बहुत ये पेर रहा 

बोझ बनकर मेरा भी समय ये ले रहा 

हा तुमने कहा है,फिर क्यों तुम सब रो रहा 

अब रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी 

मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे ।।


रहता मौत हाथ मेरे तो न देता कष्ट तुझे 

रहता नहीं यहां मै दिन–रात परे परे ,

चला जाता कब ही इस जग को छोड़ के ।

अब क्यों रोते हो इस हालत में देख के ।।

तुम रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी 

मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे।।

                          अमित कुमार वंशी                        

     

गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

छोड़ मुझे बेहतर पाना

छोड़ मुझे खुश रहना,पर मुझसे बेहतर पाना 

जो सह सके तेरे नखरे,जो रह सके आजीवन तेरे 

अपने दुःख को भूल कर , पहले दुःख तेरे निवारे 

उफ की आवाज सुन वो, पास तेरे दौरे आवे 

हमसे हुए कमी भी वो पूरी कर,तेरे मन को भावे 


बुलंदियों को चुमती हुई, बढ़ रही हो लगातार 

बढ़ते जाओ, कुछ बेहतर पाओ, मान बढ़ाओ 

इस पल में वह खुद की वाह वाही न लूट कर 

जो दे तेरे सभी असफलता मे,अपना पूरा साथ 

भर कर बाहों में वो तुझे , दिलाए पूरा विश्वाश

तुम फिर लेकर आस,करो मुसीबत से विजई प्राप्त 


मै देखूं अंजान राही बन,जब हाथ पकड़ तुझे घुमाए 

पगडंडी पर तुझे चलाए और खुद झाड़ी से टकराए 

वह छन देख मेरा मन तुझे नही पारकर भी इतराएगा 

खुद को समझा कर, छोड़ बीते पल को मेरा भी मन 

अब एक नया जीवन मे तुझे देख भूलना चाहेगा ।।


कभी हो संयोग से आमने सामने तो खुद को छुपाऊ 

बनकर आईना मै देखूं अक्सर, पर मै न नजर आऊ 

मन दुःखी है, क्रोधित है खोकर पर मै कैसे बतलाऊं 

पर तुम खुश है संग उसके , यह देख मै इतराऊं ।।


                                    अमित कुमार वंशी                        


                               

क्या यही है वो देश जिसकी हमने तमन्ना की थी?

1. बेबसी और तानाशाही का साया  जहाँ कानून की आँख पर पट्टी नहीं, बस खामोशी का पहरा है, जहाँ सत्ता की ज़िद के आगे, हर आम आदमी का ज़ख्म गहरा है।...