करुणा से भरकर पूछती हूँ, आज पिता जी आपसे,
क्या वंश बढ़ाने को ही बस, जन्मी थी मैं आपसे?
क्या दोष मेरा था जो मुझको, ऐसे दलदल में ढकेल दिया?
समाज की झूठी आन हेतु, मेरी खुशियों का खेल किया?
फिर एक बार दोहराती हूँ, हाँ आप विजयी, मैं हार गई,
रूढ़ियों की ज़ंजीरों में फिर, एक मासूम बेकसूर बँध गई।
मेरे क्या सपने थे, इसकी परवाह न किसी ने जरा करी,
नाचे-गाए, किलकारी मारी, सबने अपनी मनमर्जी करी।
मुझे खूब सजाया-सँवारा भी, और तालियों का शोर हुआ,
एक अनजाने से पुरुष संग, संबंधों का फिर ज़ोर हुआ।
रातों-रात अपनों से मुझको, इतना अनजान बना डाला,
बैठाकर जिसके संग, उसने जीवन का साथी कह डाला।
अब कैसे बतलाऊँ आपको, कैसे वो रात बीती होगी,
आँसुओं से लथपथ अंचल में, सासें भी रीती होगी।
कौन समझता दर्द मेरा, जब सब अपरिचित साथ खड़े,
थी लाडली आपकी तो, क्यों ऐसे सितम मुझ पर ढाए?
आपकी कठोरता ने आकर, मन मेरा झकझोर दिया,
क्या बोझ थी मैं? जो बिन सोचे, यूँ बेगानों से जोड़ दिया।
मेरी चाहत को बिना जाने, क्यों मुझे मुकाम न पाने दिया?
हाँ आप विजयी, मैं हार गई, क्यों झूठा मान ज़ताने दिया?
क्या याद नहीं जो रो-रोकर, विनती मैं आपसे करती थी?
"अकेले ही जीवन जी लूँगी", ये बात मैं आपसे कहती थी।
तब भी समाज का डर देकर, मुझको ही दोषी ठहराया,
अपनों की नीयत और वफ़ा को, झूठा कह-कहकर बहलाया।
था धर्म एक, थी जाति एक, इंसान बड़ा ही वो नेक था,
पर भेड़ियों की बातों में आकर, आपने भी उसमें खोट गिना।
अनजाने संग कैसे रह पाऊँ? कैसे मन की बात कहूँ?
जो हत्यारों जैसा व्यवहार करे, उस समाज को क्यों सहूँ?
मेरी जैसी ना जाने कितनी, बेटियाँ ठगी ही जाती हैं,
घुट-घुटकर उस दलदल में फिर, चुपचाप वहीं ढल जाती हैं।
करुणा से भरकर पूछती हूँ, आज पिता जी आपसे,
क्या वंश बढ़ाने को ही बस, जन्मी थी मैं आपसे?
अमित कुमार वंशी
