1.बेबसी और तानाशाही का साया
जहाँ कानून की आँख पर पट्टी नहीं, बस खामोशी का पहरा है,
जहाँ सत्ता की ज़िद के आगे, हर आम आदमी का ज़ख्म गहरा है।
चाहे कितना भी घिनौना गुनाह कर दे कोई रसूखदार,
उसके सिर पर हाथ है आका का, नहीं होती कोई गिरफ्तारी या वार।
हम किसी पार्टी के अंधभक्त नहीं, हम तो देश हित की बात करते हैं,
पर जब भी पूछते हैं सवाल, हम पर 'देशद्रोही' के ठप्पे जड़े जाते हैं।
हमारी निष्ठा को बाहरी साज़िश बताकर अफवाहें फैलाई जाती हैं,
या तो सलाखों के पीछे डाला जाता है, या फिर हमारी सांसें छीन ली जाती हैं।
2.धर्म और जाति का घिनौना बाजार
जहाँ वोटों की खातिर भाइयों के बीच दीवारें खींची जाती हैं,
धर्म और जाति के नाम पर नफ़रत की आग सुलगवाई जाती है।
खुद को 'धर्म रक्षक' बताने वाले नेता जब गद्दी पर बैठ जाते हैं,
तो धर्मस्थलों के घोटालों पर होंठों को सी लेते हैं, चुप हो जाते हैं।
दूसरों के बच्चों को जो दंगे करने की राह दिखाते हैं,
उन्हीं के अपने बच्चे दूसरे धर्म में ब्याह रचाते हैं।
अंधभक्त भी गूंगे बनकर देखते रहते हैं यह सारा तमाशा,
और जब कानून का डंडा पड़ता है, तो नेता झाड़ लेते हैं अपना दामन और आशा।
3.एम्बुलेंस बनाम काफिला (V.I.P संस्कृति)
जिस देश में सड़क पर एम्बुलेंस में तड़प रहा हो कोई लाचार,
उसकी टूटती साँसों से ज़्यादा कीमती होता है नेता का गुबार।
रास्ता रोक दिया जाता है, सायरन की गूँज में चीखें दब जाती हैं,
क्योंकि साहिब का काफिला गुज़रना है, आम जान की क्या बिसात रह जाती है!
एक बार चुनाव जीत गए तो पुश्तों का इंतज़ाम हो जाता है,
देश का खज़ाना लुटता है और उनका घर आबाद हो जाता है।
4.युवाओं का दर्द और पेपर लीक का दंश
सालों-साल जो रात-दिन एक करके किताबों में आँखें फोड़ते हैं,
अपनी जवानी, अपनी खुशियाँ, माँ-बाप के सपने जोडते हैं।
पर चंद पैसों के खातिर परीक्षा के पर्चे बाज़ार में बिक जाते हैं,
साक्ष्य मिलने पर भी अफ़सर आँखे मूँदकर सबूत मिटाते हैं।
जब सड़कों पर उतरता है देश का युवा, हक माँगने के लिए,
तो मीडिया पूछती है—"क्या सब पढ़ने वाले ही आए हैं यहाँ लड़ने के लिए?"
शांतिपूर्ण अनशन पर लाठियाँ बरसती हैं, भीड़ में उपद्रवी मिलाए जाते हैं,
पथराव कराकर सच्चे आंदोलनों को 'बदनाम' घोषित किए जाते हैं।
5.मीडिया का ढोंग और अतीत के बहाने
जब हम पूछते हैं आज के हुक्मरानों से उनका हिसाब,
तो वे कल की नाकामियों का थमा देते हैं हमें जवाब—
"तब कहाँ थे तुम, जब पहले भी ऐसा होता आया था?"
अरे! हम तब नादान थे, और इसीलिए तो तुम्हें चुनकर लाया था!
क्या सवाल पूछना गुनाह है? क्या चुप रहना ही देशभक्ति है?
क्या संसद में सिर्फ नेताओं के फायदे की बात होना ही तरक्की है?
महंगाई की मार से कमर टूट रही, जनता दाने-दाने को तरसती है,
और सदन में नेता हित के बिलों पर तालियाँ गड़गड़ाती हैं।
6.उम्मीद की किरण और नया सवेरा
पर याद रखो ऐ ज़ालिमों, यह देश किसी नेता की जागीर नहीं,
यह करोड़ों मासूमों के पसीने और शहीदों के खून की तस्वीर है।
आज नहीं तो कल, यह सोई हुई जनता जाग ही जाएगी,
तुम्हारी हर चालाकी, हर नफ़रत की साज़िश को पहचान जाएगी।
हम रोते हैं इस देश की हालत पर, क्योंकि हम इससे बेइंतहा प्यार करते हैं,
हम सिर झुकाकर अत्याचार सहने से, अब हर हाल में इनकार करते हैं।
उठेगा एक दिन ऐसा तूफ़ान, जो सच्चा सवेरा लाएगा,
यह भारत फिर से जनता का होगा, और भारत माँ का मस्तक मुस्कुराएगा!
अमित कुमार वंशी

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