हाथ में डिग्रियाँ हैं,
आँखों में हजारों ख्वाब,
फिर भी नौकरी की कतार में
खड़ा है एक बेहिसाब।
कहते हो—
“नौकरी नहीं तो स्वरोज़गार करो,
चाहे पकौड़े छानकर ही बेचो…”
पर एक सवाल है साहब,
शर्म किसको आनी चाहिए?
उस युवा को,
जिसने रातें किताबों में जलाईं?
या उस व्यवस्था को,
जिसने उसकी मेहनत की कीमत घटाई?
जिस देश का युवा
पढ़कर भी बेरोज़गार है,
जहाँ डिग्री हाथ में
और भविष्य उधार है,
वहाँ सवाल युवा से नहीं—
सत्ता के गलियारों से होना चाहिए।
क्योंकि सत्ता
कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी है,
जनता की उम्मीदों की
सबसे बड़ी साझेदारी है।
अगर युवा से कहा जाए—
“कुछ भी कर, बस कमाओ,”
तो फिर पूछना पड़ेगा—
देश चलाने का काम किसका है?
पकौड़ा बेचने में शर्म नहीं,
मेहनत करने में शर्म नहीं,
शर्म तो तब होनी चाहिए
जब करोड़ों युवाओं की मेहनत के बाद भी
उनके हिस्से में
सिर्फ इंतज़ार हो।
युवा से सवाल मत करो
कि रोजगार क्यों नहीं बना पाया,
सवाल उनसे करो
जिन्हें देश ने रोजगार और भविष्य बनाने के लिए
सत्ता में बैठाया।
डिग्री आज भी बोलती है,
बस व्यवस्था सुनती नहीं…
और युवा आज भी लड़ रहा है,
बस उसकी लड़ाई
अखबारों में दिखती नहीं।
अमित कुमार वंशी
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