शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

क्या यही वो देश जिसकी हमे तमन्ना थी?



1.बेबसी और तानाशाही का साया 

जहाँ कानून की आँख पर पट्टी नहीं, बस खामोशी का पहरा है,

जहाँ सत्ता की ज़िद के आगे, हर आम आदमी का ज़ख्म गहरा है।

चाहे कितना भी घिनौना गुनाह कर दे कोई रसूखदार,

उसके सिर पर हाथ है आका का, नहीं होती कोई गिरफ्तारी या वार।

हम किसी पार्टी के अंधभक्त नहीं, हम तो देश हित की बात करते हैं,

पर जब भी पूछते हैं सवाल, हम पर 'देशद्रोही' के ठप्पे जड़े जाते हैं।

हमारी निष्ठा को बाहरी साज़िश बताकर अफवाहें फैलाई जाती हैं,

या तो सलाखों के पीछे डाला जाता है, या फिर हमारी सांसें छीन ली जाती हैं।

2.धर्म और जाति का घिनौना बाजार 

जहाँ वोटों की खातिर भाइयों के बीच दीवारें खींची जाती हैं,

धर्म और जाति के नाम पर नफ़रत की आग सुलगवाई जाती है।

खुद को 'धर्म रक्षक' बताने वाले नेता जब गद्दी पर बैठ जाते हैं,

तो धर्मस्थलों के घोटालों पर होंठों को सी लेते हैं, चुप हो जाते हैं।

दूसरों के बच्चों को जो दंगे करने की राह दिखाते हैं,

उन्हीं के अपने बच्चे दूसरे धर्म में ब्याह रचाते हैं।

अंधभक्त भी गूंगे बनकर देखते रहते हैं यह सारा तमाशा,

और जब कानून का डंडा पड़ता है, तो नेता झाड़ लेते हैं अपना दामन और आशा।

3.एम्बुलेंस बनाम काफिला (V.I.P संस्कृति)

जिस देश में सड़क पर एम्बुलेंस में तड़प रहा हो कोई लाचार,

उसकी टूटती साँसों से ज़्यादा कीमती होता है नेता का गुबार।

रास्ता रोक दिया जाता है, सायरन की गूँज में चीखें दब जाती हैं,

क्योंकि साहिब का काफिला गुज़रना है, आम जान की क्या बिसात रह जाती है!

एक बार चुनाव जीत गए तो पुश्तों का इंतज़ाम हो जाता है,

देश का खज़ाना लुटता है और उनका घर आबाद हो जाता है।

4.युवाओं का दर्द और पेपर लीक का दंश 

सालों-साल जो रात-दिन एक करके किताबों में आँखें फोड़ते हैं,

अपनी जवानी, अपनी खुशियाँ, माँ-बाप के सपने जोडते हैं।

पर चंद पैसों के खातिर परीक्षा के पर्चे बाज़ार में बिक जाते हैं,

साक्ष्य मिलने पर भी अफ़सर आँखे मूँदकर सबूत मिटाते हैं।

जब सड़कों पर उतरता है देश का युवा, हक माँगने के लिए,

तो मीडिया पूछती है—"क्या सब पढ़ने वाले ही आए हैं यहाँ लड़ने के लिए?"

शांतिपूर्ण अनशन पर लाठियाँ बरसती हैं, भीड़ में उपद्रवी मिलाए जाते हैं,

पथराव कराकर सच्चे आंदोलनों को 'बदनाम' घोषित किए जाते हैं।

5.मीडिया का ढोंग और अतीत के बहाने 

जब हम पूछते हैं आज के हुक्मरानों से उनका हिसाब,

तो वे कल की नाकामियों का थमा देते हैं हमें जवाब—

"तब कहाँ थे तुम, जब पहले भी ऐसा होता आया था?"

अरे! हम तब नादान थे, और इसीलिए तो तुम्हें चुनकर लाया था!

क्या सवाल पूछना गुनाह है? क्या चुप रहना ही देशभक्ति है?

क्या संसद में सिर्फ नेताओं के फायदे की बात होना ही तरक्की है?

महंगाई की मार से कमर टूट रही, जनता दाने-दाने को तरसती है,

और सदन में नेता हित के बिलों पर तालियाँ गड़गड़ाती हैं।

6.उम्मीद की किरण और नया सवेरा 

पर याद रखो ऐ ज़ालिमों, यह देश किसी नेता की जागीर नहीं,

यह करोड़ों मासूमों के पसीने और शहीदों के खून की तस्वीर है।

आज नहीं तो कल, यह सोई हुई जनता जाग ही जाएगी,

तुम्हारी हर चालाकी, हर नफ़रत की साज़िश को पहचान जाएगी।

हम रोते हैं इस देश की हालत पर, क्योंकि हम इससे बेइंतहा प्यार करते हैं,

हम सिर झुकाकर अत्याचार सहने से, अब हर हाल में इनकार करते हैं।

उठेगा एक दिन ऐसा तूफ़ान, जो सच्चा सवेरा लाएगा,

यह भारत फिर से जनता का होगा, और भारत माँ का मस्तक मुस्कुराएगा!

                                                                     अमित कुमार वंशी                                                   





जनता कब तक चुप रहेगी?

यह कैसा देश बना दिया हमने,
जहाँ सत्ता ही कानून हो गई,
कुर्सी पर बैठा कोई नेता
तो हर गलती माफ़ हो गई।

हत्या हो, बलात्कार हो,
तानाशाही का राज हो,
कानून उसके घर की चौखट पर
क्यों इतना बेबस आज हो?

नेता हो या उसका परिवार,
क्यों कोई उन्हें छू नहीं पाता?
कितना भी घिनौना अपराध हो,
सिस्टम क्यों आँखें मूँद जाता?

हम किसी दल के अंधभक्त नहीं,
हम देशहित की बात करते हैं,
पर सत्ता से सवाल पूछें तो
देशद्रोही कहलाते हैं।

कभी फंडिंग विदेशी बतलाते,
कभी देश बेचने का इल्ज़ाम,
सच बोलने वालों के हिस्से
क्यों आता है जेल और बदनाम?

कभी परिवार को निशाना बनाते,
कभी जान से मार दिया जाता,
डर के मारे सच बोलने वाला
आखिर चुप हो ही जाता।

जब घर पर संकट आता है,
तब विपक्ष दरवाज़े पर आता है,
मदद के नाम पर तस्वीर खिंचाकर
अपना चेहरा चमकाता है।

पर जब संकट शुरू हुआ था,
तब उनकी चौखट तक जाने नहीं दिया,
मदद के लिए जो हाथ बढ़ाया,
उसे रास्ते में ही रोक दिया।

यह कैसी राजनीति है देश में,
जहाँ दर्द भी अवसर बन जाता है?
जनता का आँसू सूखने से पहले
नेता का पोस्टर छप जाता है।

जाति के नाम पर वोट माँगते,
धर्म के नाम पर आग लगाते,
एक-दूसरे के खिलाफ़ भड़काकर
खुद को धर्मरक्षक कहलाते।

किसी के हाथ में पत्थर देकर
किसी के दिल में नफ़रत भरते,
फिर उसी भीड़ के मरने पर
चुपचाप किनारे खड़े रहते।

अपने घर में धर्म की दीवारें
क्यों अचानक टूट जाती हैं?
पर जनता के बीच वही दीवारें
क्यों तलवारें बन जाती हैं?

सवाल करो तो मौन खड़े हैं,
जैसे सबके हों होंठ सिले,
धर्म के नाम पर लड़ने वाले
क्यों नेता के आगे चुप मिले?

जो भीड़ को आगे करते हैं,
वही संकट में दूर हो जाते हैं,
और जिनके लिए लोग लड़ते हैं,
वही उन्हें पहचानने से मुकर जाते हैं।

यह कैसा देश बना दिया हमने,
जहाँ एम्बुलेंस रुक जाती है,
पर नेता का काफिला आते ही
पूरी सड़क झुक जाती है।

जिस सड़क पर किसी की साँसें
जीवन के लिए लड़ती हैं,
वहीं सत्ता की गाड़ियों के आगे
जनता की धड़कनें मरती हैं।

एक बार कुर्सी मिल जाए तो
दो-तीन पीढ़ियाँ खा जाती हैं,
जनता की मेहनत से कमाई दौलत
नेताओं की तिजोरी भर जाती है।

भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी,
कि फल पीढ़ियों तक आता है,
जनता जीवन भर मेहनत करती,
नेता का परिवार बैठकर खाता है।

और जब युवा परीक्षा देता है,
तो उसकी मेहनत बिक जाती है,
कहीं पेपर पहले ही बिकता है,
कहीं उसकी उम्मीद लीक हो जाती है।

प्रूफ मिलते हैं, सबूत मिलते हैं,
फिर भी कार्रवाई नहीं होती,
जब तक जनता सड़क पर न उतरे
तब तक सरकार क्यों नहीं जागती?

धरना हो, प्रदर्शन हो,
जब आवाज़ बहुत बढ़ जाती है,
तब जाँच की एक टीम बनाकर
फाइल किसी कोने में सो जाती है।

कभी किसी गरीब को पैसे देकर
दोष अपने सिर लेने को कहते हैं,
और असली गुनहगार सत्ता की छाया में
आज भी सुरक्षित रहते हैं।

जाँच कब पूरी होगी—
किसी को कुछ मालूम नहीं,
मुद्दा कब दबा दिया जाएगा—
इसका भी कोई हिसाब नहीं।

और जब लाखों युवा
भूखे-प्यासे बैठ जाते हैं,
तो कुछ मीडिया हँसकर पूछता है—
“क्या सब परीक्षा देने वाले हैं?”

“बाकी लोग तो पढ़ रहे हैं,
तुम क्यों सड़क पर आए हो?”
अरे, जिनका भविष्य लूटा गया,
उन्हें ही दोषी क्यों ठहराए हो?

हम पूछते हैं उन लोगों से,
जो सवालों से घबराते हैं—
क्या देशहित यही है कि
देश में कुछ भी हो और लोग चुप रह जाते हैं?

कहते हो—
“पहले वाली सरकार में क्या हुआ था?”
हम तब छोटे थे,
शायद समझ नहीं थी,
शायद आवाज़ नहीं थी,
शायद हमें बोलने का अधिकार ही नहीं था।

और अगर पहले गलत हुआ था,
तो तुम्हें चुना क्यों गया था?
क्या इसलिए कि तुम भी वही करोगे
जिसके खिलाफ़ तुमने हमें जगाया था?

सत्ता बदलने का मतलब क्या
सिर्फ़ चेहरा बदलना है?
या फिर जनता की उम्मीदों को
फिर से धोखा देना है?

शांतिपूर्ण अनशन हो तो
लाठियाँ क्यों बरसती हैं?
जो अपने हक़ के लिए बैठे हों,
उन पर पुलिस क्यों टूट पड़ती है?

कभी भीड़ में कुछ लोग आकर
पत्थर और हिंसा फैलाते हैं,
फिर शांत बैठे लोगों के माथे
उसी हिंसा का कलंक लगाते हैं।

कौन थे वे?
किसके इशारे पर आए थे?
क्यों हर बार शांत आंदोलन को
हिंसा के नाम पर बदनाम कराए थे?

क्योंकि सत्ता को बस चाहिए
एक बहाना—एक इल्ज़ाम,
फिर जनता पर कार्रवाई हो जाए
और दब जाए सारा सवाल।

पक्ष हो या विपक्ष हो,
सदन में नेता ही नेता हैं,
जनता के सवाल पीछे खड़े,
कुर्सी के सवाल आगे हैं।

महँगाई बढ़ती जाती है,
बेरोज़गारी घर में आती है,
पर सदन में जनता से ज्यादा
नेताओं की कुर्सी बचाई जाती है।

बिल पास होते जाते हैं,
बहसें होती जाती हैं,
पर आम आदमी की आवाज़
फाइलों में दबती जाती है।

कभी-कभी लगता है सचमुच
देश फिर गुलाम हो गया है—
विदेशी हाथों से नहीं,
अपने ही नेताओं के हाथों हो गया है।

फर्क बस इतना है—
तब जंजीरें दिखाई देती थीं,
आज जंजीरें दिखाई नहीं देतीं,
क्योंकि उन्हें जाति, धर्म,
नफ़रत और झूठ के नाम पर पहनाया जाता है।

जनता को जनता से लड़ाकर
सत्ता अपनी कुर्सी बचाती है,
और जब जनता सवाल पूछती है
तो उसे देशभक्ति सिखाती है।

पर याद रखना, ऐ सत्ता के मालिकों,
जनता हमेशा मूर्ख नहीं रहती,
जो आज तुम्हारी चालों में उलझी है,
वह कल सब समझ सकती है।

आज जो नफ़रत बो रहे हो,
कल उसका हिसाब होगा,
आज जो जनता को बाँट रहे हो,
कल वही जनता जवाब होगी।

जनता ने तुम्हें देश चलाने को
अपना प्रतिनिधि बनाया है,
अपना साम्राज्य बनाने को नहीं,
अपना परिवार पालने को नहीं।

कुर्सी जनता की अमानत है,
इसे अपनी जागीर मत समझो,
जनता को कमजोर और बेवकूफ
बार-बार मत समझो।

क्योंकि एक दिन—
न जाति काम आएगी,
न धर्म का नारा,
न झूठी देशभक्ति,
न भीड़ का सहारा।

उस दिन जनता पूछेगी—
“हमने तुम्हें चुना था देश के लिए,
तुमने देश को क्यों बाँटा?”

“हमने तुम्हें चुना था न्याय के लिए,
तुमने न्याय को क्यों बेचा?”

“हमने तुम्हें चुना था विकास के लिए,
तुमने अपना घर क्यों भरा?”

“हमने तुम्हें चुना था जनता के लिए,
तुमने जनता को ही क्यों डराया?”

और उस दिन
न कोई अंधभक्त होगा,
न कोई अंधविरोधी,
सिर्फ़ एक सवाल होगा—

क्या यह देश नेताओं का है?

नहीं!

यह देश जनता का है।

और जब जनता जागेगी,
तो नफ़रत की दीवारें गिरेंगी,
झूठे नारों की आवाज़ दबेगी,
सवालों की आवाज़ उठेगी।

क्योंकि लोकतंत्र में
चुप रहना हमेशा शांति नहीं होता—
कभी-कभी चुप्पी
तानाशाही की सबसे बड़ी ताकत होती है।

इसलिए सवाल पूछो,
पर सच के साथ पूछो।

विरोध करो,
पर हिंसा के बिना करो।

नेता को नेता समझो,
भगवान मत बनाओ।

पार्टी को पार्टी समझो,
देश मत बनाओ।

और याद रखो—

देश किसी नेता से बड़ा है,
जनता किसी पार्टी से बड़ी है,
और संविधान किसी कुर्सी से बड़ा है।

आज नहीं तो कल,
जनता सब समझ जाएगी।

और जिस दिन जनता ने
डर से ऊपर उठकर सवाल पूछ लिया—

उस दिन सत्ता को
जनता के सामने
जवाब देना ही पड़ेगा।

क्योंकि लोकतंत्र में
जनता चुप हो सकती है,
पर हमेशा के लिए
सोई नहीं रह सकती। 

                             अमित कुमार वंशी                                            


गुरुवार, 16 जुलाई 2026

बाबा के सिरहाने रखे कुछ रुपये

स्मृतियों की धुंधली गलियों में, जब अतीत उतरकर आता है,

बाबा! आपका स्नेहिल चेहरा मन के दीप जलाता है।


याद है मुझे वह स्वर अब भी, जिसमें अपनापन बहता था—

“वंशी, पैसे ले लेना बेटा, सिरहाने के पास रखा है।”


“जितना खर्च लगे, ले लेना, मन में संकोच न लाना,

पैसों के कारण, मेरे बच्चे, कभी कोई कष्ट न पाना।”


कितने साधारण थे वे शब्द,पर अर्थ अनन्त समाया था,

मेरे हर छोटे-से सपने में आपका हृदय समाया था।


न प्रश्न किया—कहाँ खर्च होंगे? न कोई लेखा माँगा था,

मेरे ऊपर विश्वास आपका ईश्वर से भी ऊँचा था।


आपने रुपये नहीं दिए थे, आपने राह दिखाई थी,

मेरी आँखों के हर सपने में अपनी नींद गँवाई थी।


जब भी कोई कठिनाई आई, जब भी मन घबराया था,

आपके शब्दों ने चुपके से मुझको फिर संभाला था।


अब भी जब मैं राहों पर हूँ, जब मंज़िल दूर दिखाई देती,

आपकी आवाज़ भीतर से कहती “वंशी, चिंता मत करना…

पैसों से कोई दिक्कत नहीं होगी।”


पर बाबा…अब सिरहाने के पास वो रुपये रखे नहीं मिलते,

आपको पुकारूँ तो आप लौटकर आते नहीं मिलते।


घर वही है, आँगन वही है, वही पुरानी दीवारें हैं,

पर आपकी आवाज़ के बिना सब सूनी-सूनी राहें हैं।


कभी मन करता है लौटकर आपके चरणों में बैठ जाऊँ,

कह दूँ— “बाबा, पैसे चाहिए…”और बचपन-सा मुस्काऊँ।


आप फिर कहते—“ले लो वंशी, जितना लगे ले लेना,

बस पैसों के कारण अपने सपनों को मत रोक देना।”


काश समय फिर लौट सके, काश वो दिन फिर आ जाए,

काश बाबा की एक पुकार फिर मेरे कानों तक आ जाए।


पर समय की कठोर धारा पीछे मुड़कर आती नहीं,

बाबा की प्यारी छाया फिर आँखों से जाती नहीं।


आज समझ पाया हूँ बाबा—वो रुपये केवल रुपये न थे,

वे आपकी तपती हथेली के स्नेह-सिक्त आँसू थे।


वे मेरी राहों की पूँजी थे, वे मेरे सपनों का मान थे,

वे मेरे जीवन के अंधेरों में आपके जलते दीप समान थे।


आज भले ही हाथों में आपके दिए रुपये नहीं हैं,

पर बाबा, आपकी दी हुई हिम्मत आज भी मुझसे दूर नहीं है।


मैं जब भी टूटता हूँ भीतर, आप मुझे संभाल लेते हैं,

यादों के उस पुराने घर से चुपके से मुस्कुरा देते हैं।


और मैं फिर उठ खड़ा होता हूँ, फिर संघर्षों से लड़ता हूँ,

क्योंकि मैं केवल वंशी नहीं—आपका वंशी हूँ, बाबा!


जिस दिन मेरी मंज़िल होगी, जिस दिन सपने साकार होंगे,

उस दिन सबसे पहले बाबा, आँसू मेरे तैयार होंगे।


आकाश की ओर देखकर कहूँगा—

“बाबा, देखिए… आपका वंशी आया है,

आपके दिए हुए विश्वास ने आज मुझे यहाँ पहुँचाया है।”


आप दूर सही, पर पास हैं बाबा, मेरी हर धड़कन में रहते हैं,

सिरहाने के पास रखे रुपयों से कहीं अधिक 

आप मेरी आत्मा में रहते हैं।


और आज भी, जब जिंदगी मुझे डराती है,

आपकी आवाज़ भीतर से आती है—

“वंशी…जितना खर्च लगे, ले लेना,

पैसों के कारण कोई दिक्कत नहीं होना चाहिए…”


बाबा…पैसे तो अब सिरहाने के पास नहीं हैं,

पर आपका आशीर्वाद आज भी सिरहाने रखा है।

और शायद इसी कारण आपका वंशी आज भी

कभी भी किसी मोड़ पर हारना सिखा नहीं  है । 





तुमसे नाराज़ नहीं हूँ… बस तुम्हें हारते हुए नहीं देख सकता

 कुछ AE ऐसे हैं, जो बिना कहे भी अपना कर्तव्य निभाते हैं, अपने सपनों को मेहनत से जोड़ते हैं, और हर दिन थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ते हैं। आपको देखकर ...