गुरुवार, 26 जून 2025

रो मत,जाने दे

   अब रो मत जाने दे     

रो मत , जी लिया मै जिंदगी अपनी ।

मत रोक मुझे , जाना है अब जाने दे ।।

पा लिया है सब कुछ,अब बचा क्या है?

भर गया है अब जी मेरा ,अब जाने दे ।।


अब क्यों रहे बोझ बनकर इस जग में ?

रोना वहां जहां जन्म लेते ही मर जाता है,

जो जिंदगी का मजा भी नहीं ले पाता है ।।

तुम रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी ,

मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे ।।


चाहता नहीं बोझ बनकर जीना यहां ,

अपने कारण कष्ट किसी दूसरे को देना ।

नहीं भा रहा मुझे भी परे-परे सोना ।।

तुम रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी 

मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे ।।


अब भा रहा मुझे जग छोड़ के जाना ,

माना किया है बहुत तुम शेवा मेरा –

 पर कहा भी है कि बहुत ये पेर रहा 

बोझ बनकर मेरा भी समय ये ले रहा 

हा तुमने कहा है,फिर क्यों तुम सब रो रहा 

अब रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी 

मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे ।।


रहता मौत हाथ मेरे तो न देता कष्ट तुझे 

रहता नहीं यहां मै दिन–रात परे परे ,

चला जाता कब ही इस जग को छोड़ के ।

अब क्यों रोते हो इस हालत में देख के ।।

तुम रो मत जी लिया मै जिंदगी अपनी 

मत रोक मुझे जाना है अब जाने दे।।

                          अमित कुमार वंशी                        

     

गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

छोड़ मुझे बेहतर पाना

छोड़ मुझे खुश रहना,पर मुझसे बेहतर पाना 

जो सह सके तेरे नखरे,जो रह सके आजीवन तेरे 

अपने दुःख को भूल कर , पहले दुःख तेरे निवारे 

उफ की आवाज सुन वो, पास तेरे दौरे आवे 

हमसे हुए कमी भी वो पूरी कर,तेरे मन को भावे 


बुलंदियों को चुमती हुई, बढ़ रही हो लगातार 

बढ़ते जाओ, कुछ बेहतर पाओ, मान बढ़ाओ 

इस पल में वह खुद की वाह वाही न लूट कर 

जो दे तेरे सभी असफलता मे,अपना पूरा साथ 

भर कर बाहों में वो तुझे , दिलाए पूरा विश्वाश

तुम फिर लेकर आस,करो मुसीबत से विजई प्राप्त 


मै देखूं अंजान राही बन,जब हाथ पकड़ तुझे घुमाए 

पगडंडी पर तुझे चलाए और खुद झाड़ी से टकराए 

वह छन देख मेरा मन तुझे नही पारकर भी इतराएगा 

खुद को समझा कर, छोड़ बीते पल को मेरा भी मन 

अब एक नया जीवन मे तुझे देख भूलना चाहेगा ।।


कभी हो संयोग से आमने सामने तो खुद को छुपाऊ 

बनकर आईना मै देखूं अक्सर, पर मै न नजर आऊ 

मन दुःखी है, क्रोधित है खोकर पर मै कैसे बतलाऊं 

पर तुम खुश है संग उसके , यह देख मै इतराऊं ।।


                                    अमित कुमार वंशी                        


                               

सोमवार, 3 मार्च 2025

बेकसूर बेटी की पुकार

करुणा से भरकर पूछती हूँ, आज पिता जी आपसे,

क्या वंश बढ़ाने को ही बस, जन्मी थी मैं आपसे?

क्या दोष मेरा था जो मुझको, ऐसे दलदल में ढकेल दिया?

समाज की झूठी आन हेतु, मेरी खुशियों का खेल किया?


फिर एक बार दोहराती हूँ, हाँ आप विजयी, मैं हार गई,

रूढ़ियों की ज़ंजीरों में फिर, एक मासूम बेकसूर बँध गई।


मेरे क्या सपने थे, इसकी परवाह न किसी ने जरा करी,

नाचे-गाए, किलकारी मारी, सबने अपनी मनमर्जी करी।

मुझे खूब सजाया-सँवारा भी, और तालियों का शोर हुआ,

एक अनजाने से पुरुष संग, संबंधों का फिर ज़ोर हुआ।


रातों-रात अपनों से मुझको, इतना अनजान बना डाला,

बैठाकर जिसके संग, उसने जीवन का साथी कह डाला।


अब कैसे बतलाऊँ आपको, कैसे वो रात बीती होगी,

आँसुओं से लथपथ अंचल में, सासें भी रीती होगी।

कौन समझता दर्द मेरा, जब सब अपरिचित साथ खड़े,

थी लाडली आपकी तो, क्यों ऐसे सितम मुझ पर ढाए?


आपकी कठोरता ने आकर, मन मेरा झकझोर दिया,

क्या बोझ थी मैं? जो बिन सोचे, यूँ बेगानों से जोड़ दिया।


मेरी चाहत को बिना जाने, क्यों मुझे मुकाम न पाने दिया?

हाँ आप विजयी, मैं हार गई, क्यों झूठा मान ज़ताने दिया?

क्या याद नहीं जो रो-रोकर, विनती मैं आपसे करती थी?

"अकेले ही जीवन जी लूँगी", ये बात मैं आपसे कहती थी।


तब भी समाज का डर देकर, मुझको ही दोषी ठहराया,

अपनों की नीयत और वफ़ा को, झूठा कह-कहकर बहलाया।


था धर्म एक, थी जाति एक, इंसान बड़ा ही वो नेक था,

पर भेड़ियों की बातों में आकर, आपने भी उसमें खोट गिना।

अनजाने संग कैसे रह पाऊँ? कैसे मन की बात कहूँ?

जो हत्यारों जैसा व्यवहार करे, उस समाज को क्यों सहूँ?


मेरी जैसी ना जाने कितनी, बेटियाँ ठगी ही जाती हैं,

घुट-घुटकर उस दलदल में फिर, चुपचाप वहीं ढल जाती हैं।


करुणा से भरकर पूछती हूँ, आज पिता जी आपसे,

क्या वंश बढ़ाने को ही बस, जन्मी थी मैं आपसे?

                     अमित कुमार वंशी                                             



सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

धोखेबाज नेताओ

धोखेबाज नेता 

ओ संसद में बैठे धोखेबाज नेताओं ,

एक बात तुम जरा मुझे बतलाओ ।

क्या खुद किए सारे वादे भुल गए ?

या अपनी लाज-शर्म धुलकर पी गए ।।

मुझे लगता खुद को तुम भारत देश का ,

मालिक समझ अहंकार मे है टूल गए ।।


ये भुल मत की जनता देश के मालिक है,

जिसने ताज पहना बैठाया तुझे गद्दी पर,

वही गिराया है कितनो को मुंह के बल ।।

क्यों पोत रहा कालिख अपने मुख पर ,

जिम्मेदारी को ठोकर मार, मनमानी जारी है।।


जो किया तेरा उद्धार कर रहा उसपे अत्याचार ,

कभी लाठियां वर्षा कर,कभी गोला फेंकवा कर 

क्या यही तेरी जिम्मेवारी है या तुम अत्याचारी है?

हम जनता की भी इसमें भी बड़ी भागेदारी है ,

कभी जाती भेद भाव का पाठ पढ़ाकर -

बड़ी-बड़ी लालच दिलाकर, बहलाकर फुसलाकर,

भोले जनता को मूर्ख बनाकर तुम सत्ता पाते हो।।


जिस दिन बिन बंटवारे, एक होकर आवाज उठाएं,

तुम्हारे किए सभी वादे गिनवाए और पूरे करवाएं ।

मुकरे वादे से, तो कालिख पोत चौराहे पर घुमाए,

फिर होश में आओगे, झूठे वादे करना भूल जाओगे ।।


एक बात जरा सत्ता में बैठे सभी नेता समझ जाओ, 

खुद के लापरवाही से, जब खुद पर सवाल पाते हो -

बीती बाते सुनाते हो, अब तक जो हुआ गिनाते हो ।।

फिर क्यो आज तुझे जनता सत्ता में लाकर बैठाया?

तेरे वादों को सुनकर विचार बनाया तब जिताया ,

जनता मूर्ख नहीं बस भोला है, गलती नहीं दोहराएगा।

वोट के समय किए वादे से, नहीं बहला फुसला पाएगा ।

अब भी सुधर जाओ नहीं तो मुंह के बल गिराएगा।।

       

                                        अमित कुमार वंशी 





शुक्रवार, 9 अगस्त 2024

बूढ़ी माई की बोझ

  बूढ़ी माई की बोझ

चलले बानी एक सफर में ,

हम बहुत कुछ देख तानी ।

लेकिन ओहु मे एक खास बा,

हम मन ही मन ओके जोह तानी ।।


एक बूढ़ी माई बगले बैठल ,

आपन टोकरी खिसका ब तानी।।

बोझ रहे,भरल पूरा सामान से,

इतना उम्र मे काहे उठा ब तानी।।


रहल नही गईल पूछल बीन हमरो,

कहलस हमसे, नहीरा जाई तानी ।।

अभी त कम पर गईल सनेश हमरा,

लागता राउर आऊरो देवे के चाह तानी।।


सुन ई जवाब हमरा दिमाग बौराईल,

अंदर ही अंदर मन बहुत खीसीयाईल।

लेकिन ऊहो काहे कहिहन नही हमसे,

बाड़ी जीवन के पीड़ा से चिरचिड़ाईल।

ओहू में हम देहली आग लगाई ।।


फिर से कहली,ऐ माई मत खिसियाईं ,

तनिक ऐमे से दीही हमरो के चीखाई।।

कहनी एगो लमहर नोट थमाई ,

ई पुरा राऊर भईल ए बूढ़ी माई।।


तब आंचल से लोर पोछ कहनी हमसे,

जीवन में खानी हम आपन कमाई।।

एही बतीया जब संतान समझ पाई,

ई बोझ संघ मन के भी बोझ मीट जाई।।


बतियात - बतियात गईल स्टेशन आई ,

देहली माथ पर हम उनकर टोकरी धराई।।

सच मे ई बोझ उनका ला हलका रहे,

मन मे बाड़ी रखले बड़का बोझ छुपाई।।

                                      अमित कुमार वंशी 




मंगलवार, 6 अगस्त 2024

पूछती है दुनिया

         पूछती है दुनियां 

आंखें लाल देख पुछती है दुनिया,

क्या बे तुम पी रक्खा है ।।

जबाब दू तो क्या दू जनाब उनसे ,

काफी है कि मैं इस जहा में जी रक्खा है।।


मुर्दा शरीर नही पर मन अब जिंदा कहां है, 

आंसू भरी इन आंखों मे सपना कहा है ।।

आज भी टटोलती है आस पास उसे ,

पर वो कमबख्त यहां मौजुद कहा है ।। 


क्या नही थी मेरी,वो सब कुछ थी,

मेरे अंधेरी आत्मा की प्रकाश थी। 

वो मेरी चाहत थी , मेरी राहत थी ,

उसी से जीवन में मुस्कुराहट भी थी ।। 


मन कहता है आएगी एक दिन वापस, 

मेरे साथ निभाने,संग नई दुनियां बशाने ।।

इतनी वो कठोर नही है,ओ दुनियां वाले ,

देखना लाएगी एक दीन मेरे लिए चांद तारे।।


कभी यादों में,कभी बांहों मे उसे महसूस कर,

कभी मेरी आंखें बरस जाती है तो 

आंखें लाल देख पूछती है दुनिया ,

क्या बे तुम पी रक्खा है ।।

जबाब दू तो क्या दू जनाब उनसे ,

काफी है कि मैं इस जहा में जी रक्खा है।।

                            

                                  अमित कुमार वंशी                          


                      






हर लाल आँख शराब की गवाह नहीं होती,

कुछ आँखें अधूरे ख़्वाबों और बिछड़ते रिश्तों की भी कहानी कहती हैं।

उन्हीं एहसासों को शब्द देने की एक छोटी-सी कोशिश...

आपकी कमी

      आपकी कमी 

आपके न होने की कमी है जैसे कि ,

अंधेरी रातों में बुझी मोमबत्ती की तरह।

रोशनी है जिसकी इतनी कि - 


चारों ओर उजाला ही उजाला कर दे।

पर मजबुर है वो भी इतना कि- 

पहले तो उसे चिंगारी सहारा कर दें ।।


है इंतजार मे उसके जो प्यारा है, 

बीन उनके ऐ जिन्दगी आवारा है। 

महत्व है इसे जबतक उसका सहारा है।।


बीन प्रकाश अंधेरे में कुचला जाएगा, 

चाह कर भी ऐ कुछ न कर पाएगा । 

सहेगा कितना , बेखबर हो जाएगा ।।


भाव है तेरे साथ होने से जाने जग सारा, 

तु न हो साथ तो जिंदगी है आवारा। 

जैसे मोमबत्ती को चीराग का है सहारा।।

     

                                अमित कुमार वंशी 

महामारी

            

पूरी जग में यह महामारी 

है सबको यह सता रही ।। 

न जात देख कर, न धर्म देख कर, 

फैल रही लापरवाही देख कर।। 

फिर क्यो घर की चौखट लांघ - 

लोग चौक-चौराहे पर मुस्तैद है ? 

महामारी महामारी करती दुनिया, 

फिर भी कुछ लोग बेखौफ है ।।


जानकर भी अंजान बने है, 

मन बहलाने बाहर चले है ।। 

खुद संक्रमण का खौफ त्याग- 

जान जोखिम में डाल रहे है,

अपने निर्दोष परिवार को भी- 

ऐसी बड़ी महामारी में फसा रहे ।। 

ईस संकट कि घड़ी मे भी न वो 

कोई सर्तकता को अपना रहे ।। 

महामारी - महामारी करती दुनिया, 

फीर भी कुछ लोग बेखौफ है ।।


जानकर सारा जग का हाल - 

वो नही कर रहे देश हित का व्यवहार ।। 

जब जनता न माने जनहित का विचार, 

तब क्या ही करेगी कोई  भी सरकार ? 

महामारी - महामारी करती  ये दुनिया, 

फीर भी कुछ लोग बेखौफ है ।।


है समय अभी भी देश बचालो, 

खुद मे ही कुछ बाते ठान लो ।। 

वे वजह भीड़ चौक-चौराहे से हटा लो, 

अपना कर्तव्य स्वयं नीभा लो ।। 

एक बार फिर से लौट आएगा - 

खुशियां भरा ए जग संसार, 

वो बाजार और चौराहे कि शोर, 

फिर लौट जाना मनचाहा आजादी कि ओर।।

                                   अमित कुमार वंशी                  



परदेशी

             मै परदेशी 

मै उनको करता शत - शत प्रणाम, 

जिस मिट्टी पर जन्मे कितने वीर महान ।। 

क्यों न उनका परदेशी हु लेकिन, 

करता हूं मै उनका भी गुनगान ।।


सच गाने में क्या जाता है, 

जब वो है सच में ही महान ।। 

जय-जय भारत जय-जय भारत, 

तु तो है मां भारत बहुत महान ।। 

कास मै भी होता इस धरती पर जन्मा, 

जहां होता है तेरा इतना सम्मान ।।


इस जन्म में तो तुमसे रिश्ता जोड़ा, 

अगले जन्म में मां मुझको भी तु- 

लेना स्वीकार कर बेटा मान, 

ताकि मैं भी खड़ा हो तिरंगे के नीचे- 

गा सकू जन गण मन का गान ।। 

माना इस जन्म में तेरा परदेशी हु पर, 

अपना सिर दिया हु तेरे चरणों में थाम ।।

जय - जय भारत , जय - जय भारत ,

तू तो है मां भारत बहुत ही महान ।।


                                अमित कुमार वंशी 

बिहार

           बिहार

अप्पन माटी सबके प्यारी,

है हम भी जन्मजात बिहारी ।।

कोई राज्य न ऊंच है ना नीच ,

सबके अप्पन खास पहचान है ।

वैसे ही बिहार के अप्पन रीत।।


मगही मैथिली भोजपुरी जहां,

है अनमोल भाषा में बातचीत ।।

गर्व है हमरो अप्पन माटी पर,

जहां उगता हर ऋतु में कितना चीज।।


क्या नहीं है जी हमरा ईहवा ?

प्राकृतिक नदियां हैं वन उपवन है,

राजा महाराजा के प्राचीन किला है।।

अनेकों धर्म के ईहवा मेला है,

महापुरुषों के साड़ी यादें है ।।


हम बिहारी बड़ा संस्कारी हैं

दया भाव है खून में हमरा,

पर अन्याय न सहना बीमारी है ।।

पड़ोसी हो या क्यों न परदेशी ,

सबके लिए दिल में बराबर सम्मान है।।


जितना प्यार है अप्पन माटी से,

उतना ही है सब हमरा हित । ।

कभी खत्म ना होगा गुणगान बिहार का,

आइए ना कभी बिहार ओ हमारे मीत।।


                                          अमित कुमार वंशी 

नशा जीवन में

      नशा जीवन में 

हमने सीखा है नशा में जीना यारो ,

हर नशा की अपनी भाव अलग है।।

छोटे उम्र की नशा की दाव अलग है।

जिद्द कर पा लेना हर ख्वाहिश ,

न मिले तो रोकर करना फरमाइश ।।


नशा दोस्ती की भी हमने देखी है,

साथ खेलना और झगड़ना, दंड झेलना।।

एक दोस्ती हमने चाहत में भी बदला है,

उसे पा लेने की नशा भी हमने झेला है।

दुनियां को उसके बराबरी हमने तौला है।।

लड़ना - झगड़ना और फिर मिलकर रहना,

मीठी मीठी बातें करना भी उससे सीखा है।।

नशा थी ये बड़ी बदनाम भरी जीवन की,

मैने इसको भी बहुत करीब से झेला है।।


नशे शोहरत की भी हमने देखी है,

कर मेहनत कड़ी शरीर को भी तोड़ा है।।

असंभव को संभव कर हमने जवानी में,

दो पैसे ज्यादा कमाकर हमने रक्खा है।।


अब नशा है हमे ज्यादा दिन जीने की,

छोर कर समोसे और चाट, जलेवी 

अब हम काजू और किशमिश खाता हु।।

कुछ और दीन जी पाऊं, रोज यही जताता हु,

हर मंदिर में जाकर मन्नत यही गोहराता हु ।।


                      अमित कुमार वंशी                                 

यह कविता बहुत ही मार्मिक और गहरी है, जो जीवन के विभिन्न पड़ावों पर अनुभव किए गए "नशों" का सुंदर चित्रण करती है। यह दोस्ती, प्रेम, सफलता और अंत में स्वस्थ जीवन की चाहत को बखूबी दर्शाती है ।





सोमवार, 5 अगस्त 2024

पापा

                 पापा

सूरज की रोशनी जैसे कारक होते है पापा 

पर वो देख मुझे चिन्तित नरम होते है पापा ।। 

सहला कर पीठ पर हाथ पकड़ा अंगूली की गांठ,

दुबारा उठ खड़ा हो कर लड़ने की साहस देते पापा ।।


जब गिरा अपने पथ पर कभी डांटा कभी दिया चाटा,

प्यार था उसमे उनका की करे अच्छा आगे चलकर ।। 

कभी भी मेरे पापा छोरा नही मुझे गिरा वैसे पल ,

किया खड़ा कठिनायों से भी लड़ने को डट कर ।

मेरे प्यारे पापा , मेरे न्यारे पापा ।।


पर्वत जैसे खड़ा होकर, लड़ते बाधाएं से डटकर ,

पर वो रखते परिवार को हमेशा सुरक्षित कर ।। 

दर्द होता कभी, बैठ जाते बंद कोठरी चुप्पी साध कर,

रोते वोभी कठिनायों से, पर देख नहीं पाता कोई वो पल ।।

बड़े जिद्दी है वो, बीमार होकर भी चले जाते काम पर ,

मेरे प्यारे पापा, मेरे न्यारे पापा ।।


देख मां की खराब तबियत, मां बनकर करते फर्ज पूरी,

हर दुख मे हर दर्द मे हमेशा अपनी चाहत को मारकर,

परिवार की चाहत को साकार करते अपनी फर्ज पूरी।।

मेरे प्यारे पापा, मेरे न्यारे पापा ।।

                                        अमित कुमार वंशी 

सोच जगत में

  सोच जगत में 

सोच बुरी जगत में जिसकी 

वह बुरा ही कर पाता है। 

साड़ी दुनिया के सामने हमेशा,

वह बुरा ही कहलाता है । 

पाता है न इज्जत किसे से, 

कही प्यार भी न वो पाता है। 

मजाक उड़ाता दुनिया उसकी, 

यदि वह कभी कही भी जाता है।


क्यों करे हम बुरा जग में, 

क्यो भरे अपने मन की टब में। 

दुरुपयोगी पानी क्यों भरे, 

भर के ही वह क्या पाता है? 

जब उपभोग ही न कर पाता है।


यदि कभी वह कही भी ,

अच्छी सीख भी दिलाता है। 

कुछ सच-सच भी बतलाता है। 

बुरा ही समझ उसकी बातो को 

मजाक में सभी हंसकर उड़ाता है


ओ मानव, जरा तुम अभी भी, 

छोड़ दो बुरा सोचना जग में। 

नहीं तो तुम कभी भी नहीं, 

कर पाओगे अच्छा इस जग मे 

ये इतनी सुंदर सी जिंदगी भी,

चली जाएगी यू ही वेवजह मे ।

                    अमित कुमार वंशी                          


नए वर्ष

           नए वर्ष 

आओ मनाएं खुशियों का त्यौहार, 

था जिसका सबको कबसे इंतजार । 

मिटाकर सारी गम और दर्द भरा व्यवहार, 

मिलकर बनाएं एक खुशहाल संसार।


ना जात पात न भेद भाव है, 

है ऐसा यह भाईचारे का त्यौहार। 

आया फिर एक वर्षों के बाद 

लेकर खुशियों से भरा उपहार ।

अच्छाई को गले लगा बुराई दूर भगाना है, 

नई किरण की लाली में तपकर- 

उन्नति का परचम लहराना है, 

जो पाया नहीं बीते पल उसे इस बार पाना है।


कर नेक कार्य बुरी जगत को भगाएंगे, 

लोगों के साथ मिलकर नए वर्ष मनाएंगे। 

रूठे लोगों से मिलकर गले फिर से मुस्कुराएंगे ।

उदास लम्हों को भूलकर जीवन सरल बनाएंगे ,

इस वर्ष को पिछले वर्ष से बेहतर बनाएंगे।


                               अमित कुमार वंशी 

पेड़ की वाणी

 पेड़ की वाणी 

हम मानव के भलाई में, 

उसके जीवन के उपजाऊ में- 

आती मै काम हमेशा । 

बचपन से बुजुर्ग के बाद भी, 

होती मानव को मेरी आवश्यकता ।


मै न होती तो मानव न होता, 

क्योंकि हमसे ही प्राप्त करता वो- 

जीवन का कितनी अनमोल उपहार, 

ऐ जग का सारा इंसान ।


गर्मी की उस करी धुप में जब ,

तप कर मानव थक जाता है ।

तब देख वह मुझे उस एकांत में- 

खुश हो आकर मेरे ही छांव में , 

बैठकर मानव हमेशा सुस्ताता है।


मै भी निःस्वर्थ भाव से मानव को- 

अपने आंचल को हीला सुस्त कराती हु, 

फिर भी प्यार न पाती हू, मै काटी जाती हू। 

कैसे होते है ये मानव ब्रज हृदय वल शाली , 

मैं यह कभी भी नही समझ पाती हूं ।


                                    अमित कुमार वंशी 

तुमसे नाराज़ नहीं हूँ… बस तुम्हें हारते हुए नहीं देख सकता

 कुछ AE ऐसे हैं, जो बिना कहे भी अपना कर्तव्य निभाते हैं, अपने सपनों को मेहनत से जोड़ते हैं, और हर दिन थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ते हैं। आपको देखकर ...